आपस की बात.कैटवॉक का अर्थ तो यही होना चाहिए कि एक बिल्ली की चाल (चलने का या टहलने) का तरीका कैसा होता है? इसे ही कैटवॉक कहा जाता होगा। बिल्ली को धीरे-धीरे किसी मुंडेर या छत की दीवार पर चलते कई बार देखा है, पर उसके चलने या टहलने में ऐसा कोई खूबसूरत अंदाज नहीं दिखा कि वह विश्व सुंदरियों या किन्हीं परिधानों के प्रदर्शन की मंच प्रस्तुतियों के लिए आदर्श चाल निर्धारित की जाए। इसे कैटवॉक का नाम क्यों दिया गया? यह प्रश्न बहुत बार घुमड़ता रहता था।
अंतत: डिक्शनरी (शब्द कोष) का सहारा लिया तो पता चला कि संकरे पथ (रास्ते) या प्राचीर की पगडंडी को कैटवॉक कहा जाता है। शायद बहुत संकीर्ण होने के कारण इस पर संभल-संभलकर ध्यान से चलने का यह अंदाज हो। दरअसल, यह सारा झमेला पिछले दिनों प्रकाशित एक समाचार के कारण उपजा था। अलवर (राजस्थान) की कुछ महिलाओं को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सफाई वर्ष घोषित होने पर न्यूयॉर्क में होने वाले एक कार्यक्रम के लिए चुना गया था। यह खबर लगभग हर समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। सुलभ इंटरनैशनल की पहल और सहायता से मैला ढोने के काम से मुक्त की गई यह महिलाएं न्यूयॉर्क गईं।
वहां नीली साड़ी पहनकर इन्होंने विश्व प्रसिद्ध मॉडल्स के साथ मंच पर कैटवॉक की। इससे पहले दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में भी महिलाएं भारत की खूबसूरत अमीर और जगमगाती मॉडल्स के साथ कैटवॉक कर चुकी थीं। नीली साड़ी में हाथ उठाकर अभिवादन करते हुए इनके फोटो प्रकाशित हुए थे। यह दर्दनाक और पीड़ादायक नारकीय त्रासदी से मुक्ति का पर्व रहा होगा, पर इसके लिए न्यूयॉर्क के मंच पर कैटवॉक करने की क्या जरूरत पड़ी थी। इन महिलाओं के परिवारों के पुरुष भी तो इस त्रासदयी स्थिति से गुजरते होंगे। उनके मुक्ति पर्व को मनाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? इस सारे अति नाटकीय बाजारवादी प्रदर्शन में महिला मुक्ति की बात को कैटवॉक से जोड़कर ही क्यों देखा जाना चाहिए? इन महिलाओं के परिवारों के बच्चों का स्वास्थ्य कैसा है? वे स्कूल जा पा रहे हैं या नहीं? इनके परिवार के पुरुष नशाखोरी को छोड़ पाए या नहीं? गंदे, बदबूदार घरों के नारकीय निवासों में रहने की मजबूरी से इन्हें निजात मिली की नहीं?
इन महिलाओं के बहाने यही बात बार-बार याद करना और समझना जरूरी है कि नारी मुक्ति, आत्म सम्मान को कैटवॉक से जोड़कर देखना सही नजरिया नहीं है। महिलाओं और युवतियों के देह प्रदर्शन से नारी स्वतंत्रता जुड़ी हुई नहीं है। उन परिस्थितियों और ऐसे माहौल को बनाने की जरूरत है जहां संकरे पुल या रास्ते पर भी हर समय चौकन्ने रहने और संभलकर चलने की जरूरत न रहे। हर एक महिला, युवती का आत्म सम्मान बना रहना जरूरी है।