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कोटा. पैर के टखने (टेलस) में फ्रेक्चर हो जाने पर उसकी मृत हड्डी (ए वेस्कुलर नेफ्रोसिस) में नई जान फूंकने के लिए कोटा के एक डॉक्टर ने 14 साल के अध्ययन के बाद टीबियो टेलर आथरेडिसिस तकनीक विकसित की है।
इस तकनीक में रोगी के टखने की सफल सर्जरी करने के 6 माह से एक साल के बाद मृत हड्डी में खून का दौरा फिर से शुरू हो जाता है, जिससे मरीज सामान्य लोगों की तरह चलने-फिरने लगता है।
कनाडा के क्यूबेक सिटी में अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑथरेपेडिक सर्जन और कनाडा ऑथरेपेडिक एसोसिएशन की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय एकेडमिक कॉन्फ्रेंस में कोटा के ऑर्थेपेडिक सर्जन डॉ. जसवंतसिंह ने त्नटीबियो टेलर आथरेडिसिसत्न तकनीक को बताया। विशेषज्ञों ने माना कि टेलस की मृत हड्डी में जान फूंकना रिसर्च का मुद्दा है, इस तकनीक पर अब सूक्ष्म परीक्षण किए जाएंगे।
डॉ.सिंह ने एक्स-रे फिल्म और ऑपरेशन के वीडियो के माध्यम से बताया कि टखने का फ्रेक्चर हो जाने परउसके जोड़ खराब हो जाते हैं, जिससे रोगी सामान्य रूप से चल-फिर नहीं सकता है, लेकिन क्षतिग्रस्त जोड़ की मृत हड्डी को फिर से जीवित बनाने के लिए यह तकनीक कारगर साबित हुई है। इससे पहले डॉक्टर मृत हड्डी को बाहर निकाल देते थे। कॉन्फ्रेंस में दुनिया के एक हजार से ज्यादा ऑथरेपेडिक चिकित्सकों ने भाग लिया।
इनका कहना है..
ऐसे मामले असामान्य होते हैं, 90 फीसदी लोगों में दुर्घटना के कारण टखने में फ्रेक्चर हो जाता है, इस तकनीक से एक रोगी का ऑपरेशन के बाद तीन साल तक परीक्षण किया गया, अब वह पूरी तरह सामान्य है।
- डॉ.जीडी रामचंदानी, ऑथरेपेडिक सर्जन
यह रोग बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। तकनीक का सफल प्रयोग निश्चित ही एक उपलब्धि है, कोटा के चिकित्सक ने कनाडा में एकेडमिक कॉन्फ्रेंस में प्रजेन्टेशन देकर शहर और राज्य का गौरव बढ़ाया है।
-डॉ.मोहम्मद इकबाल, ऑथरेपेडिक सर्जन
ऐसे जीवित होती है मृत हड्डी
टखने का फ्रेक्चर हो जाने पर ऑपेरशन के दौरान एंकल जोड़ को फ्यूज करके टखने की टूटी हड्डी को साफ करके वापस लगा दिया जाता है, रोगी के पैर के सामने से टीबिया की हड्डी की स्लाइस को वहां ग्राफ्ट कर देते हैं जिससे मृत हड्डी (टेलिक्टॉमी) को सपोर्ट मिल जाता है। करीब 6 माह से 1 साल बाद मृत हड्डी में रक्तसंचार शुरू होने लगता है। इसके बाद रोगी सामान्य तरीके से चलने-फिरने लगता है।
20 रोगियों पर सफल परीक्षण
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नई तकनीक पर कम से कम 3 साल का अध्ययन और परीक्षण जरुरी होता है। डॉ. सिंह ने 1984 में इस तकनीक पर काम शुरू किया था और अब तक वे 20 रोगियों पर इसका सफल परीक्षण कर चुके हैं।
ये मिलेंगे फायदे
>> ऑपरेशन के 1 साल बाद रोगी चलने-फिरने लायक हो जाता है।
>> पंजे की सुंदरता बहाल हो जाती है, जोड़ बेहतर काम करने लगते हैं।
>> लंबी दूरी तक चलने में कोई परेशानी नहीं होती है।
टेलस की तकनीक का डॉ. जसवंत ने 20 रोगियों पर सफल प्रयोग किया है। अन्य रोगियों को लाभ मिल सकेगा।
- डॉ.पीके वशिष्ठ, विभागाध्यक्ष, ऑथरेपेडिक विभाग, राजकीय एमबीएस अस्पताल