Breaking News 
bhaskar Web English


HomeManoranjanCinemaBollywood Bollywood

समाज के सांस्कृतिक डीएनए में मिलावट

परदे के पीछे.सप्ताहांत की फुर्सत का लाभ उठाने के लिए फिल्में हमेशा शुक्रवार को प्रदर्शित की जाती रही हैं। यह बात अलग है कि कुंडली में शुक्र ग्रह सफलता का घोतक माना जाता रहा है। टेलीविजन की दुनिया में भी दर्शक की पसंद और संख्या के आधार पर आकलन का प्रकाशन शुक्रवार को ही होता है। उस दिन तमाम चैनल दफ्तरों में शेयर की मंडी दलाल स्ट्रीट सा ही उत्तेजक वातावरण होता है।

उस उत्तेजना का वर्णन करना आसान काम नहीं है और कोई भी चैनल उसे फिल्मांकित करके दिखाना नहीं चाहता। सफलता के इस आकलन को टीआरपी कहते हैं।

टेलीविजन पर लोकप्रियता का यह आकलन टेम पीपुलमीटर सिस्टम नामक संस्था करती है। जरा पीपुलमीटर शब्द पर गौर फरमाएं-मनुष्य की पसंद को मापने की विधि। इस संस्था ने लगभग 6000 मीटर अलग आर्थिक वर्ग के परिवारों के टेलीविजन में लगाए और सप्ताह भर वे लोग जो कार्यक्रम देखते हैं, उसकी जानकारी मीटर की रिकॉर्डिग के माध्यम से संस्था को मिल जाती है। इसी के आधार पर टीआरपी बनती है। इसी आकलन के आधार पर सीरियल को न केवल विज्ञापन मिलते हैं, वरन विज्ञापन की दर भी घटती-बढ़ती है।

सारांश यह कि सैटेलाइट उद्योग की आत्मा का पंछी टेम के पिंजरे में कैद रहता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 20 हजार करोड़ का यह व्यवसाय इसी टीआरपी पर निर्भर करता है। इस प्रणाली की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है, परंतु 100 करोड़ की आबादी वाले देश की रुचियों का आकलन 6000 मीटर से कैसे किया जा सकता है। संभवत: हमारे देश में एक करोड़ टेलीविजन सेट हैं। यह भी संभव है कि मीटर लगे टेलीविजन वाले घर में दो टेलीविजन सेट हों और मीटर वाले टेलीविजन पर घर के बूढ़े लोग और नौकर-चाकर कार्यक्रम देखते हो, वहीं युवा और बच्चों का वर्ग दूसरे मीटरविहीन टेलीविजन पर मनपसंद कार्यक्रम देखता हो।

शायद यही कारण है कि आईपीएल के क्रिकेट मैचों की औसत टीआरपी लगभग चार रही और उसी कालखंड में रोने-धोने वाले सास-बहू सीरियल की टीआरपी पांच से ऊपर रही। पूरा देश जिस क्रिकेट नशे में चूर था, उसका आकलन हजार एपिसोड तक रबर की मानिंद खिंचने वाले सीरियलों से कम रहा। सबसे भयावह बात यह है कि टीआरपी गिरते ही चैनल का कार्यक्रम अधिकारी कहानी और चरित्र चित्रण में परिवर्तन करने लगता है। सीरियल के निर्देशक को मुजरिमनुमा कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

विष का असर रखने वाले शब्दों के कोड़ों से उसे लहूलुहान कर दिया जाता है। सीरियल के संसार में कला, साहित्य व संगीत में आमूल परिवर्तन किया जाता है। मरे हुए लोकप्रिय पात्र को पुन: जीवित किया जाता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि चैनल के दफ्तर में कथा चयन समिति के अध्यक्ष के सामने एक लेखक सगर्व कहता है कि उसके पास कमाल की रीग्रेसिव (पतनोन्मुख) कथा है। नकलीपन, रोना धोना, कुरीतियों को आभा मंडित करना, अंधविश्वासों को शाश्वत सत्य की तरह प्रस्तुत करना, अनैतिक संबंधों को दोहराना इत्यादि सभी कुटैव इस कमबख्त टीआरपी के लिए किए जाते हैं जो 6000 मीटर की गागर में भारतीय समाज के सागर को भरने का दावा करता है और सारे चैनलों के भाग्य विधाता इस संकीर्णता को गीता मानकर उस पर हाथ रखकर शपथ लेते हैं।

सीरियल संसार की सारी विकृतियों का जन्म इसी आकलन की गंगोत्री से होता है। आज तक इसे चुनौती देना तो दूर, इसके विकास, प्रसार की बात भी किसी ने नहीं की है। पुन: स्पष्ट करते हैं कि यहां व्यवस्था की ईमानदारी की बात नहीं की जा रही है। वरन अजब-गजब फैलते भारत की रुचि इतने छोटे से पैमाने पर नहीं आंकी जा सकती। इस पूरे मामले का एक और गंभीर पक्ष यह है कि छोटे परदे पर प्रस्तुत कार्यक्रमों का व्यापक प्रभाव है और सामाजिक फिजा बिगाड़ने के लिए यह जवाबदार हैं।

देश में पहले से व्याप्त सांकृतिक शून्य को इस गटर के पानी के समान प्रदूषित चीज से भरने की कुचेष्टा सफल हो चुकी है। सरकार और समाज कैसे इतनी भयावह चीज को अनदेखा कर रहे हैं और 20 हजार करोड़ का यह उद्योग सामाजिक प्रतिबद्धता की कितनी अवहेलना कर रहा है। भावी नस्लों का डीएनए भी बिगाड़ा जा रहा है। क्या पेट में पलते बालक पर इस घिनौने सीरियल संसार का प्रभाव नहीं पड़ रहा है। देश के सांस्कृतिक डीएनए की मिलावट को देखते हुए भी विचारशील माथों पर बल नहीं पड़ रहा है। कृपया इस पूरे प्रसंग को स्वयंभू सांस्कृतिक पहरेदारों का मामला नहीं समझें।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: