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पारदर्शिता है समय की जरूरत

आलेख. चौबीस घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों के दौर में पहली बार हुई विश्वास मत की संसदीय बहस रियलिटी शो में तब्दील हो गई। इसमें राजनेता स्टार परफॉर्मर थे जबकि देश ने निर्णायक और दर्शक की भूमिका निभाई। संसद में चला ड्रामा मजेदार भी था और त्रासद भी। लोकसभा में अचानक लाखों रुपए के बंडल लहराने लगे, जिन्हें अध्यक्ष की टेबल पर रख दिया गया। वोटिंग तकनीक अवसर के मुताबिक नहीं चल पाई। कुछ सांसदों को सदन में स्ट्रेचर पर लाया गया। लालू प्रसाद यादव ने सदन को ठहाके लगाने पर विवश कर दिया जब उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे भी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। यद्यपि एक सवाल अभी भी बाकी है कि क्या हमने इस हफ्ते जो भी देखा, उससे हमारा संसदीय लोकतंत्र मजबूत हो रहा है?

दागी सांसदों का ही मामला लें, जिन्हें मतदान के लिए अपनी जेल की कोठरी से एक हफ्ते की छूट दी गई। जहां दागी सांसदों के मत डालने को लेकर कानूनी तौर पर कोई पाबंदी नहीं है, वहां ऐसे नैतिक सवाल जरूर उठने चाहिए कि क्या हत्या जैसे संगीन अपराधों में फंसे लोग संसद की तकदीर का फैसला कर सकते हैं? विश्वास मत में जहां एक-एक वोट अहम है, राजनीतिक पार्टियां कह सकती हैं कि उन्हें अपने ‘शहाबुद्दीनों’ और ‘पप्पू यादवों’ को पक्ष में इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है। आखिरकार, भले ही हम इसे पसंद करें या नहीं, वे लोगों द्वारा चुनकर आए हैं। लेकिन जिस तरह कानून उन्हें संसद में प्रवेश करने से नहीं रोकता, क्या कोई ऐसा नियम है जो विश्वास मत के दौरान उनकी उपस्थिति को अनिवार्य बनाता है? सरकार वित्त विधेयक के दौरान हार सकती है, क्या इसका आशय यह है कि जब भी वित्त विधेयक पर मतदान हो, हमारे दागी सांसदों को जेल से कुछ वक्त के लिए छोड़ दिया जाए?

सच तो यह है कि कानून बनाम नैतिकता का सवाल संसदीय आचरण के केंद्र में आ गया है। वैधानिक तौर पर सरकार ने विश्वास मत जीत लिया है, लेकिन हमारी राजनीति को लेकर कोई नैतिक संतुष्टि भी है जो विधान से ऊपर हो? दस सदस्यों ने विश्वास मत में हिस्सा नहीं लिया, बाकी एक दर्जन सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की। इनमें से कितने सांसदों ने ईमानदारी से अपनी पार्टी लाइन से विरोध जताया और कितनों ने मौद्रिक लाभों को पाने के लिए पाला बदल लिया? पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करने वाले सांसदों को संबंधित पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है, जबकि एक दलबदलू को तो उसकी नई पार्टी द्वारा अगले चुनाव में टिकट देने का वादा भी मिल चुका है। ऐसे में आखिर दलबदल विरोधी कानून की क्या अहमियत रह जाती है जो राजनेताओं के खुदरा व्यापार को रोकने के लिए बनाया गया था?

झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि सदन के भीतर किसी भी सदस्य की गतिविधि न्यायिक जांच-पड़ताल का विषय नहीं हो सकती। प्रभावी तौर पर इसका आशय यह था कि किसी सांसद को क्रॉस वोटिंग से नहीं रोका जा सकता, भले ही इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि उसने ऐसा धन के प्रभाव के चलते किया है। क्या यह कोई हैरत की बात है कि हम आज15 साल बाद संभवत: झामुमो पार्ट-1 के सीक्वल के गवाह बने हैं?

दुर्भाग्य से इसका कोई आसान हल नहीं है जो राजनीति के ‘झामुमोमीकरण’ को रोक दे। राजनीतिक व्यवस्था खंडों में बंटी है और छोटे दलों की भूमिका बढ़ रही है। उनके लिए राजनीति मोलभाव का काउंटर है इसे संभवत: अजीत सिंह की मिसाल से बेहतर समझा जा सकता है जिन्होंने पिछले हफ्ते तीन बार पाला बदला।

छोटी पार्टियों का पुख्ता जनाधार होता है और इसलिए तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियां सिकुड़ने लगी हैं। ऐसे में छोटे-छोटे दल गठबंधन व्यवस्था में काफी हद तक प्रभाव डाल सकते हैं। इसके अलावा, चूंकि इन पार्टियों पर किसी व्यक्ति विशेष का जबरदस्त नियंत्रण होता है, उनके साथ सौदेबाजी करना बहुत आसान होता है।

वास्तव में हर राजनीतिक पार्टी सांसदों की नीलामी के बाजार में शिरकत करने को बेताब नजर आती है और वह इस कार्य में अपने विरोधी से कम या ज्यादा भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होती। कांग्रेस-नीत यूपीए इस विश्वास मत में अपने भविष्य को दांव पर लगाने के बाद भले ही इसको लेकर काफी आतुर लगी हो, लेकिन क्या हम यह मान लें कि एनडीए जब सत्ता में थी तो उसने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ अपने स्तर पर मोलभाव नहीं किया होगा? एक तरह से झामुमोमीकरण ही वह कीमत है जो विचारधारा को तिलांजलि दे चुके राजनीतिक दलों द्वारा चुकाई जानी चाहिए। सिर्फ विधान से इसका समाधान नहीं मिल सकता। वैधानिक तौर पर ऐसा कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं है जो शिबू सोरेन, जिन्हें अपने पूर्व सचिव शशिनाथ झा हत्याकांड में उम्रकैद की सजा से स्थगन मिला है, को पिछले पांच वर्ष में तीसरी बार कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ लेने से रोक सके। लेकिन नैतिकता का तकाजा यही है कि जब तक अदालत से वे बरी नहीं हो जाते, उन्हें किसी मंत्रालय का पदभार नहीं लेना चाहिए।

यही पर्याप्त नहीं है। वास्तव में राजनेताओं और धन के बीच इस पूरे अंर्त्सबंध को स्पष्ट करने के लिए नए तौर पर कोई पहल करने की जरूरत है। संभवत: अब समय आ गया है कि जब राजनीतिक पार्टियां खुले तौर पर यह मान लें कि हमारा राजनीतिक तंत्र हार्ड कैश से जुड़ा है। चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए। कैडर को वफादार बनाए रखने के लिए पैसा चाहिए। ऐसे में कैसे इस धन को वैध बनाया जाए। ‘टीवी पर चले विश्वास मत’ का सबसे बड़ा सबक यही है कि इसने चौबीस घंटे टेक्नीकलर में धनबल को दर्शाया है। अब हमारे राजनेता क्या करेंगे? जरूरी है कि हमारे राजनेता एक साथ मिलकर राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शी, खुली और सार्वजनिक तकनीकों पर काम करें।

लेकिन इस अंधकार के बीच कुछ रोशनी भी है। कड़वाहट से भरी इस बहस में बेहद जबरदस्त रहा उमर अब्दुल्ला का भारतीय व कश्मीरी मुसलमान के तौर पर देशभक्ति का भावपूर्ण उद्बोधन। जूनियर अब्दुल्ला ने वह कर दिखाया जैसा करने का साहस कुछ ही राजनेताओं में है। उन्होंने स्वीकार किया कि गुजरात दंगों के बाद एनडीए सरकार से अलग न होकर उन्होंने भूल की थी। उन्होंने नैतिक शुचिता की तान छेड़ दी है। यह ऐसी मिसाल है जिसका सदन में उनके वरिष्ठ साथियों को अनुसरण करना चाहिए।

-लेखक सीएनएन-आईबीएन के एडिटर इन चीफ हैं।





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Rakesh Jain
Friday, 25th Jul 2008, 13:49
Democrasy in india is now De-moy-Kurshi (Give Me chair)at any cost.If you are appriciating Umar Abduula for his speach then ask him what happen to his moral when thousands of kasmiri pandit left the valley for last 15 year when his party was in power their.Even a single muslim faimly has left gujrat after the riots.