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यह सरकार नहीं ला पाएगी रिटेल नीति

नई दिल्ली.मौजूदा यूपीए सरकार के शासनकाल में एक विस्तृत राष्ट्रीय खुदरा नीति आने की संभावनाएं कम नजर आ रही हैं। आम चुनाव में कुछ माह शेष हैं। अब तक यह नीति बन जानी चाहिए थी लेकिन सरकार अब भी सभी वर्र्गो की राय जानने में व्यस्त है।

औद्योगिक नीति और संवर्धन (डीआईपीपी) सचिव, अजय शंकर ने स्वीकार किया है कि खुदरा ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिस पर उतनी चर्चा नहीं हुई है, जितनी होना चाहिए थी। शंकर ने यह बात बुधवार को इंडियन काउंसिल फार रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकानॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) के अध्ययन ‘माडर्नाइजेशन आफ इंडियन रीटेल’ पर आयोजित बातचीत में कही। आईसीआरआईईआर ने यह अध्ययन खुदरा क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के उतरने से छोटे दुकानदारों पर पड़ने वाले प्रभाव जानने के लिए किया है। पिछले साल प्रधानमंत्री कार्यालय ने वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को असंगठित खुदरा क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के उतरने से छोटे दुकानदारों पर पड़ने वाले प्रभाव पता लगाने के निर्देश दिए थे। बाद में यह काम आईसीआरआईईआर को सौंप दिया गया था।

कब आएगी नीति? :

शंकर ने इस सवाल के जवाब में कुछ साफ-साफ कहने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि इस समय वे सभी वर्र्गो की राय मालूम कर रहे हैं।

उद्योग चैंबरों को भी जानकारी देने को कहा गया है। उद्योग की राय है कि चुनाव करीब हैं। सरकार ऐसी नीति नहीं लाना चाहेगी जो देश के 5 करोड़ से अधिक खुदरा दुकानदारों पर नकारात्मक असर डाले। आईसीआरआईईआर के डायरेक्टर और चीफ एक्जीक्यूटिव राजीव कुमार का कहना है कि डीआईपीपी सचिव अजय शंकर ने बुधवार को खुदरा दुकानदरों, हॉकरों, किसानों और वंदना शिवा जैसे कार्यकर्ताओं की राय पांच घंटे सुनी है।

क्या निकला निष्कर्ष :

आईसीआरआईईआर ने इस अध्ययन के निष्कर्ष में कहा है कि खुदरा क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के उतरने से छोटे दुकानदारों पर खास विपरीत प्रभाव नहीं होगा। वहीं खुदरा व्यापारियों के प्रतिनिधि विदेशी कंपनियों थोक कारोबार में उतरने की अनुमति दिए जाने के साथ अपने लिए भी कारोबार के समान अवसर उपलब्ध कराए जाने की मांग कर रहे हैं।





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