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संसद में नौटंकी, सिनेमा में संसद

परदे के पीछे.गोविंदा, राजबब्बर और जयाप्रदा ने सोनिया गांधी की सरकार के पक्ष में मत दिया और धर्मेद्र और विनोद खन्ना ने विरोध में मत दिया। दरअसल दक्षिण भारत का फिल्म उद्योग राजनीति के अधिक निकट है और दशकों से रहा है। दक्षिण के सितारों के फैन क्लब का नेटवर्क बहुत बड़ा है और यही उन्हें आम आदमी के निकट रखता है। मुंबइया उद्योग के सितारों के पास इस तरह का कोई संगठन नहीं है और उनके पास दक्षिण के सितारों की तरह सामाजिक प्रतिबद्धता भी नहीं है। मौजूदा फिल्मी सांसदों में केवल राजब्बर के पास राजनैतिक समझ है क्योंकि उनकी अपने कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में रुचि रही है और वे वीपी सिंह के भी निकट रहे हैं।

नेता और अभिनेता दोनों का ही भविष्य आम आदमी के हाथ में रहता है। नेता लंबे अंतराल के बाद जनता के दरबार में हाजिर होता है, परंतु अभिनेता को हर शुक्रवार को जनता का सामना करना पड़ता है। यह सोचने वाली बात है कि सिनेमाघर में मौजूद आम आदमी चुनाव के बूथ में अलग सोच का इस्तेमाल करता है। नेता चुनने में उससे कभी-कभी गलती हो जाती है, जैसा कि सांसदों के व्यवहार से हम समझ सकते हैं। परंतु अपना मनोरंजन चुनने में वह कभी गलती नहीं करता। उसने चौपाल से कहानियां सुनना शुरू किया था और इसी अनुभव ने उसे सिनेमा की प्रारंभिक समझ भी प्रदान की।

उसका सिनेमा देखने का अनुभव लगभग 95 वर्ष का है, जबकि वोट डालने का अनुभव इसकी तुलना में काफी कम है। नेता पैसा लेकर ईमान बेच सकता है, परंतु दर्शक मनोरंजन के मामले में कभी किसी प्रचार की लहर में नहीं बहता। काश वह जितना अच्छा दर्शक है, उतना चतुर वोटर भी होता तो संसद में नौटंकी नहीं होती, भले ही सिनेमा संसद हो जाता। सिनेमाघर में दर्शक की प्रतिक्रिया से देश का सामाजिक तापमान मालूम किया जा सकता है परंतु संसद में आम आदमी के कष्ट की बात नहीं हो पाती।





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