करनाल.अब करनाल में भी बिना कांटे व एक हड्डी की मछली पैदा होगी। इसके प्रोजेक्ट पर तीन माह से काम चल रहा है, जबकि नवंबर तक उत्पादन की पहली खेप आने की उम्मीद है। ऐसे में उत्तरी भारत के मछली खाने के शौकीनों को आंध्र-प्रदेश की पुंगेसिस-पुंगेसिस मछली पर डिपेंड नहीं रहना पड़ेगा।
अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय अवार्ड से नवाजे जा चुके बुटाना के सुल्तान सिंह व सग्गा के ऋषिपाल के खेत में पुंगेसिस-पुंगेसिस मछली तैयार की जा रही है जोकि सिर्फ आंध्र-प्रदेश में ही पैदा होती है। उमस भरे दिनों में इस मछली को आंध्र-प्रदेश जैसा तापमान देकर यहां के वातावरण में फलने-फूलने का कार्य युद्घ स्तर पर जारी है। किसान मछली की दिनचर्या को नोट कर रहे हैं।
प्रोजेक्ट की सफलता के बाद अन्य किसानों को भी इस मछली पालन के प्रति जागरूक किया जाएगा। हालांकि इस पर आईसीआर पंजाब व हरियाणा तथा मत्स्य विभाग की ओर से दो वर्ष पहले शोध किया गया था, लेकिन इस वैरायटी के तापमान में न ढलने के कारण कामयाबी नहीं मिल सकी थी, जबकि करनाल के दो युवा किसानों ने हार नहीं मानी और इस मछली को अपने फार्म पर अपनी तकनीक से पैदा किया।
इस तरह से पैदा की मछली : बुटाना के सरपंच एवं प्रगतिशील किसान सुल्तान सिंह ने बताया कि वैज्ञानिकों द्वारा इस प्रोजेक्ट को ड्राप करने के बाद उन्होंने मई में अपने फार्म पर पुंगेसिस का फीड बंगलादेश से मंगवाया और उसे एक अलग तालाब में डाला। उन्होंने मछली को आंध्र-प्रदेश जैसा वातावरण देने के लिए प्रयास किए।
मछली को बहता हुआ पानी व रोजाना तीन समय खाना दिया जाता है, जिससे इसकी अच्छी तरह से ग्रोथ हो सके। यह एक ऐसी मछली है जो किसान को कम समय में दोगुना मुनाफा दे सकती है।
एयर ब्रिदर होने के कारण यह मछली पानी के ऊपर आकर सांस लेती है और पानी के कीटों को खाती रहती है। न्यूट्रियंट फीडिंग देकर एक हेक्टेयर तालाब से आठ माह के दौरान 14 से 15 टन मछली प्राप्त की जा सकती है। आम मछली पालन की अपेक्षा इस मछली पालन से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है।
सर्दी में रखें ध्यान
मत्स्य विभाग के अनुसार यह मछली पानी का तापमान 18 डिग्री से कम होने पर फल-फूल नहीं सकती, इसके लिए अलग से एहतियात बरतने की जरूरत है। तालाब का तापमान 18 डिग्री से कम न होने देने के लिए मछली को पोली हाउस में रखें ताकि मछली को उचित तापमान मिल सकें। समय-समय पर तालाब का 20-25 प्रतिशत पानी बदल देना चाहिए ताकि उसका बॉडी का तापमान बना रहे। मछली में भी मूवमेंट बना रहेगा और वह उचित खान-पान कर सकेगी।
क्या होगा फायदा
आम तौर पर मछली खाने वाले लोगों में यह भ्रांति होती है कि मछली के कांटे से मृत्यु हो सकती है लेकिन पुंगेसिस-पुंगेसिस मछली से लोगों को हड्डी व कांटा रहित मछली का स्वाद मिलेगा। उत्तरी भारत में आंध्र-प्रदेश से इस मछली को लाया जाता है। लेकिन अब करनाल में मछली पैदा होने से उत्तरी भारत के लोगों को आंध्र-प्रदेश की मछली पर डिपेंड नहीं रहना पड़ेगा। यह मछली हर्ट व एनीमिया के पेशेंंट के लिए बहुत कारगर है।
जिले के प्रगतिशील सुल्तान व ऋषिपाल की ओर पुंगेसिस-पुंगेसिस उत्पादन की पहल एक अच्छा कदम है। इस उत्पादन के बाद लोगों को हड्डी व कांटा रहित मछली मिलेगी।
-आरएस सांगवान, जिला मत्स्य अधिकारी करनाल।