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अमृतसर.अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ 151 साल पहले बगावत का झंडा बुलंद करने वाले भारतीय सैनिकों की कुर्बानी के दु:खांत ने साफ्टवेयर इंजीनियर पॉल जोजफ को अमेरिका से अमृतसर आने को मजबूर कर दिया। मगर वे इस दु:खांत के मूक गवाह कालेयांवाला खूह की दयनीय हालत देखकर दुखी हो उठे।
एक नायाब शहीदी स्मारक को नमन करने की चाह लिए भारत पहुंचे पॉल ने एक साधारण से कमरे में महज गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश देख पूछ ही लिया, क्या सरकार इस स्थल का महत्व नहीं जानती ?
अमृतसर की सीमावर्ती तहसील अजनाला में कालेयांवाला खूह, वह ऐतिहासिक जगह है, जहां 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज हुकूमत ने बगावत करने वाले लगभग 288 सैनिकों को एक कुएं में फेंक कर ऊपर से मिट्टी भर दी थी। 1983 में मद्रास से बोस्टन में जा बसे पाल के हाथ कुछ दिन पहले ‘क्राइसिस इन द पंजाब..’ नामक किताब लगी। इसे अमृतसर के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर फ्रैडरिक कूपर ने 1859 में लिखा था। इस किताब में दर्ज है कि कैसे कूपर के आदेश पर अजनाला में बागी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया था।
ऐसे जान दी आजादी के दीवानों ने :
कूपर ने लिखा है कि कैसे लाहौर के मियां मीर कैंप से भागे 26 एन.आई. कंपनी के करीब 500 निहत्थे सैनिकों को दंड स्वरूप गोलियों से उड़ा दिया गया था। कुछ तो कैंप से निकलते वक्त ही मारे गए थे। लगभग 150 को उफनती रावी नदी पार करते समय मौत की नींद सुला दिया गया था। शेष सैनिकों को गिरफ्तार कर अजनाला की अंधेरी कोठरियों में कैद कर दिया गया था।
खूह के इतिहास की जांच कर देश पर कुर्बान होने वाले सिपाहियों के सम्मान में स्मारक का निर्माण कराया जाएगा।’
- प्रो. लक्ष्मी कांता चावला, पंजाब की स्वाथ्य मंत्री और क्षेत्रीय विधायक
यहां 60 सैनिक घुटन से मर गए और 160 को थाने के बाहर खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। बाद में मृतकों और बेसुध सैनिकों को कुएं में फेंक कर उस पर मिट्टी की छोटी सी पहाड़ी बना दी गई थी।
प्रशंसा भी, निंदा भी :
इस काले कारनामे के लिए न सिर्फ पंजाब के चीफ कमिश्नर जॉन लारैंस और ज्यूडिशियल कमिश्नर राबर्ट मिंटगुमरी वरन् रियासत के राजा रणधीर सिंह ने भी प्रशंसा की, जिसे किताब में जगह दी गई है। पॉल बताते हैं कि 1859 में किताब के प्रकाशन के बाद इंग्लैंड के हाउस ऑफ कॉमंस ने इस घटना की निंदा की थी। अमृतसर के सिविल लाइंस इलाके में आज भी फ्रैडरिक कूपर के नाम पर कूपर रोड है।