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बायलाइन.
लतीफे हमेशा हमें सच्चई की ओर ले जाते हैं। मोबाइल से ‘स्टिंग इज किंग’ जैसे एसएमएस भेजे जा रहे हैं। ई-मेल में ‘निर्दयी’ वित्तमंत्री से भावुक अपील की गई है कि सांसदों की उम्र और पीठ में दर्द को देखते हुए क्या वे हजार के बजाय एक लाख रुपए के नोट नहीं छाप सकते?
क्या वे जानते हैं कि 30 करोड़ रुपए का बैग कितना भारी होता है? एक ई-मेल में तो गुस्सा जाहिर किया गया है। ‘डा. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में बहस की शुरुआत के पूर्व गुरु गोविंद सिंह की प्रसिद्ध उक्ति को दोहराया था, ‘शुभ कर्म मैं कभु न डरूं।’ प्रधानमंत्री ने अशुभ कर्म शुरू करने के ठीक पहले इसे कैसे दोहरा दिया?’
चार साल सरकार चलाने के बाद डा. मनमोहन सिंह की निजी ईमानदारी कांग्रेस की एकमात्र अक्षुण्ण विरासत थी। वोटर को कभी यह भरोसा तो नहीं ही था कि उनके मंत्री ईमानदार हैं, लेकिन वोटर इस बारे में निश्चिंत था कि प्रधानमंत्री एक ईमानदार व्यक्ति है। ‘वोट के लिए नोट’ और ‘टेप छिपाने’ के प्रकरण के बाद मनमोहन सिंह भी एक ऐसे दागी राजनेता भर रह गए हैं जो पद पर बने रहने के लिए फिक्सरों के साथ साठगांठ करने को राजी हैं।
जो पाया गया है वह खोने की तुलना में कुछ भी नहीं है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि वोटर भ्रष्टाचार की सजा देता है और सत्यनिष्ठा को पुरस्कृत करता है। बुद्धदेव भट्टाचार्य, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी को जनता का समर्थन है, क्योंकि उसे लगता है कि वे व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदार हैं।
यह उनके फिर से चुने जाने का एकमात्र कारण न भी हो तो प्राथमिक कारण तो है ही। डा. सिंह की छवि के रूप में कांग्रेस को यह लाभ प्राप्त था। अब वह प्रतिष्ठा उन्होंने खुद नष्ट कर दी है। अर्थशास्त्री के रूप में उनकी योग्यता पर मतदाताओं के भरोसे को महंगाई ने पहले ही कमजोर कर दिया था।
प्रधानमंत्री अब भ्रष्टाचार की बदबू आने पर नाक नहीं सिकोड़ सकते। सांसदों की खरीद में वे व्यक्तिगत रूप से शामिल थे। लोकसभा में बहस की पूर्वसंध्या पर दिए गए भोज के दौरान वे अनिश्चित-से थे। हालांकि शिबू सोरेन को पहले ही सरकार के पाले में एक समझौते के तहत लाया जा चुका था। सोरेन के लिए मालदार कोयला मंत्रालय, पुत्र के लिए झारखंड का उपमुख्यमंत्री पद और पार्टी सांसद के लिए दिल्ली में एक और मंत्री पद।
असली 1-2-3 समझौता तो इसे ही कहना चाहिए। सोमवार सुबह आते-आते प्रधानमंत्री मुस्कराने लगो और संसद में प्रवेश करते हुए वे अंगुलियों से विक्टरी साइन बताने लगे। संसद फूहड़ मजाक बन गई, पर इससे क्या? नैतिकता के जिस मुखौटे ने हमें चार साल मूर्ख बनाया वह अब इतिहास के डस्टबिन में पड़ा है। भाजपा के तीन सांसदों ने जब सदन की आसंदी के समीप नोटों के बंडल लहराए तो प्रधानमंत्री का चेहरा फक पड़ गया। वह बहस का टर्निग पॉइंट था।
जनता को चाहे हाइड एक्ट की बारीकियां समझ में न आई हों, लेकिन भ्रष्टाचार जरूर नजर आ रहा था जो अब तक छिपा था। अमेरिका के साथ निकट संबंधों का स्वागत करने वाले शहरी मध्यवर्ग के लोग (आप इन्हें ग्रीन कार्ड पार्टी ऑफ इंडिया कह सकते हैं) ठगा महसूस कर रहे थे, वह भी उस शख्स के हाथों जिस पर उन्होंने भरोसा किया था।
डा. मनमोहन सिंह की एक उल्लेखनीय उपलब्धि रही कि उन्होंने विपक्ष को एकजुट कर दिया। तीन दशकों से भारतीय राजनीति में यह सबसे कठिन काम था। विडंबना यह है कि उन्होंने वह सब उलट दिया जो सोनिया गांधी ने कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए किया था। उन्होंने गुजरात दंगों का इस्तेमाल भाजपा के खिलाफ दमदार गठबंधन खड़ा करने में किया था। वामपंथ से नाता तोड़कर डा. सिंह ने वह ढांचा ही तोड़ दिया।
उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी को गले लगाकर उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की तेजतर्रार वाहक मायावती को तीसरे मोर्चे की नेता बना दिया। मायावती एकमात्र क्षेत्रीय नेता हैं जिनके पास राष्ट्रीय समर्थन है। वे किसी सहयोगी को तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में उतनी ही आसानी से दलित समर्थन दे सकती हैं, जितनी आसानी से मध्यप्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में दे सकती हैं। उनके प्रत्याशी को चुनाव जीतने की जरूरत नहीं है।
चुनाव लड़कर ही वे कांग्रेस की हार सुनिश्चित कर सकती हैं। कांग्रेस यदि मायावती को सहयोगी बनाए रखती तो बेहतर होता, पर उसके लिए ऐसा नेता चाहिए जो कैश ब्रोकर के स्थान पर गणितज्ञ हो। अब सरकार मायावती को भ्रष्ट सिद्ध करने की पूरी कोशिश कर रही है। सोनिया और मनमोहन मायावती को ताज कॉरीडोर मामले में बच निकलने देने पर बहुत पछता रहे होंगे। यह उन खुशनुमा दिनों की बात है जब वे मुलायम की बजाय मायावती के साथ डील में लगे थे।
भ्रष्टाचार कांग्रेस के चरित्र में अचानक हुआ पतन नहीं है। 1952 में पहले चुनाव के पूर्व ही जीप स्कैंडल सामने आया था। लेकिन चुने हुए सांसदों को अनाप-शनाप कीमत पर खरीदना बिलकुल अलग बात है। यह बुराई तब एक सड़न में तब्दील हो गई जब पीवी नरसिंह राव ने अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए शिबू सोरेन व उनके सांसदों को खरीदा था।
शायद इस बार डा. सिंह ने सोचा कि वे अपने गुरु नरसिंह राव का कृत्य दोहराने में सफल होंगे। मार्क्स ने कहा था कि इतिहास अपने आप को दोहराता है : पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में। पर डा. सिंह तो मार्क्स पढ़ते नहीं हैं। लगता है कि सत्ता ने डा. सिंह का चरित्र और स्वभाव निर्णायक रूप से बदल दिया है। इस खरीदी हुई जीत के दौरान उनसे गरिमा की उम्मीद करना क्या जरूरत से ज्यादा अपेक्षा थी? इसके बजाय सदन में दिए जवाब में वे व्यक्तिगत स्तर पर उतर आए। पर जब संसद स्कैंडलों की पाठशाला में बदल गई हो तो शिष्टाचार की अपेक्षा करना फिजूल है।
(लेखक समाचार पत्रिका कोवर्ट के अध्यक्ष हैं।)