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‘राजपथ’ से निकले, दलाल स्ट्रीट पहुंचे

दृष्टिकोण. garg विश्वास मत पर यूपीए सरकार की जीत ने भारतीय राजनीति को ‘राजपथ’ से उठाकर ‘दलाल स्ट्रीट’ के हवाले कर दिया है। मतदान परिणाम के बाद शेयर बाजार में आई तेजी इसकी गवाह है। यह तेजी और बढ़ने वाली है।

साधु-महात्माओं का चातुर्मास चल रहा है और आम आदमी के लिए देव सोए हुए हैं पर राजनीति में इस समय तलाक और शादियां चल रही हैं। एक-एक हजार के नोट बांटे जा रहे हैं। राजनीतिक दुर्दशा की शुरुआत वामपंथियों ने की थी और अंत किसके हाथों होगा कहा नहीं जा सकता।

राजनीति में नैतिकता की अगर कोई कीमत बची हो तो पूछा जा सकता है कि जिन 19 मतों की मदद से यूपीए ने अपनी सरकार बचाई है उसका इतिहास में सौ साल बाद किस तरह से जिक्र होगा। जिस गठबंधन का देश के एक बड़े हिस्से पर राज ही नहीं उसने सौ करोड़ की आबादी वाले राष्ट्र के भाग्य का फैसला उन लोगों को खरीदकर कर लिया जिन पर उसका कोई हक नहीं था। कोई विदेशी ताकत चाहे तो समूचे भारत राष्ट्र की अस्मिता का सौदा भी कर सकती है।

राजनीतिक दुर्दशा की शुरुआत करने का दोषी वामपंथियों को इसलिए ठहराया जाना चाहिए कि यह जानते हुए भी कि डॉ. मनमोहन सिंह परमाणु करार पर कायम रहने वाले हैं, वे पैर पटकते हुए यूपीए से बाहर हो गए। चुनाव की पूर्व संध्या पर सरकार और उसकी नीतियों पर जिस तरह की लगाम कसने की जरूरत थी उसे वामदलों ने अपनी वैचारिक तानाशाही की भेंट चढ़ा दिया।

अब सरकार आने वाले दिनों में वे तमाम तथाकथित आर्थिक सुधार लागू कर देगी जो चार सालों से वामपंथियों के दबाव के चलते ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे। बदले में देश के बड़े घराने और पूंजीपति चुनाव संपन्न होने तक मुद्रास्फीति की दर को नीचे रखने का आश्वासन पी. चिदंबरम को दे देंगे।

यह सही है कि परमाणु करार पर चले घमासान ने सरकार बचाने और गिराने के परंपरागत मुद्दे बदल दिए पर यह काम वामपंथी यूपीए से अलग हुए बिना भी कर सकते थे। माकपा से निष्कासन के बावजूद सोमनाथ चटर्जी को वामपंथी विचारधारा का पालन करने से प्रकाश करात रोक नहीं पाएंगे। मनमोहन सिंह कूल बने रहे और किंग बनकर उभरे। वामपंथी क्रोध करके भी सरकार नहीं गिरा पाए।

देश का दूसरा बड़ा नुकसान अब यह होने जा रहा है कि हिंदुत्व के नाम पर अस्पृश्यता को बढ़ावा देने के लिए बदनाम भारतीय जनता पार्टी को ही राजनीतिक रूप से अस्पृश्य करार देने की कोशिशें हो रही हैं। नए तीसरे मोर्चे के नाम पर जो राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा किया जा रहा है उससे भाजपा को बाहर रखा गया है। देश के ग्यारह राज्यों में आज भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की राजनीति के न्यायसंगत ध्रुवीकरण को केवल इसलिए नहीं बदला जा सकता कि एक दलित की बेटी उत्तरप्रदेश में अपनी ऊंची आवाज के कारण समूचे देश की प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखती है। सही है कि परमाणु करार को लेकर चली विश्वास मत की राजनीति और उसका अंतिम परिणाम प्राप्त होने के बीच जिस एक बात को लेकर देश में व्यापक निराशा व्यक्त हुई वह लोकसभा में भाजपा का निराशाजनक प्रस्तुतिकरण और स्वयं के प्रयासों से पार्टी द्वारा अपने को हाशिए पर धकेल लेने का सामूहिक प्रयास थी।

एक अनुशासनबद्ध पार्टी के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए संघषर्रत भाजपा का विश्वासमत के दौरान शील भंग हो गया। अपनी ही हुकूमत वाले राज्यों की जनता को भी आडवाणी सहित भाजपा का कोई नेता बहस के दौरान कन्विंस नहीं करा सका कि परमाणु करार देश हित में नहीं है। देश को पहली बार यह भी पता चला कि भाजपा के सारे तेज तर्रार नेता लोकसभा में नहीं बल्कि राज्यसभा में पाए जाते हैं।

निश्चित ही राज्यों में लगातार कमजोर सबित होती कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा हेतु सिद्ध हो जाएगा अगर वामपंथी और मायावती तीसरे मोर्चे के नाम पर विपक्ष की राजनीति का नया गठबंधन खड़ा करने में कामयाब हो जाते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होगा कि वामपंथी दल यूपीए से बाहर होते हुए भी परोक्ष रूप से कांग्रेस की ही मदद करने में जुटे रहेंगे।

एक सशक्त राजनीतिक विपक्ष और राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित भाजपा को विश्वास मत के दौरान प्रकट हुई उसकी कमजोरियों का आधार बनाकर कमजोर करने की रणनीति पर काम करना देशहित में नहीं होगा।

ऐसा करना उस स्थिति को अंजाम देना होगा जिसमें एक अनियंत्रित हिंदू राष्ट्रवाद एक राजनीतिक दल के रूप में रजिस्टर्ड भाजपा को बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या दुर्गावाहिनी में तब्दील होने के लिए मजबूर कर दे। इसे अन्य दलों की तरह ही भाजपा में भी लोकतंत्र की खराबियों की उपस्थिति समझा जाना चाहिए कि उसके सांसदों को भी क्रॉस वोटिंग करने अथवा अनुपस्थित रहने के लिए बरगलाया जा सकता है।

कांग्रेस को अब अपने जासूस इस बात की निगरानी के लिए तैनात करने चाहिए कि मत विभाजन में पराजय से अपने को अपमानित महसूस कर भाजपा धार्मिक कट्टरवाद की गोद में जाकर नहीं बैठ जाए।

गौर करने लायक है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस लेने के बाद से जम्मू में लगी आग अभी बुझी नहीं है। भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने क्रॉस वोटिंग करने वाले अथवा मतदान में अनुपस्थित रहने वाले सांसदों के ठिकानों पर हो रहे हमलों के पक्ष में सलाह दी है कि व्हिप का उल्लंघन करने वाले सांसद अपनी सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री या सोनिया गांधी के निवास में चले जाएं।

परमाणु समझौता राष्ट्र हित में है अथवा नहीं इसकी परतें खुलने में महीने और साल गुजर जाएंगे पर कृत्रिम विजय के उन्माद में सरकार राष्ट्र हित के उन असली सवालों की अनदेखी करना नहीं शुरू कर दे जो सिर के ठीक ऊपर मंडरा रहे हैं।





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