HomeVichaar Vichaar

आतंक का जलजला और हमारी मुस्तैदी

लगभग चौबीस घंटे के भीतर देश के दो प्रमुख शहरों बैंगलुरू और अहमदाबाद के आतंकी हमलों से इस देश के हुक्मरान क्या सबक लेंगे, यह अनुमान लगा पाना तो कठिन है, लेकिन जनता यह सीख लेने को जरूर तैयार हो रही है कि अब ऐसी भयानक त्रासदियों के बीच जीना ही उसकी नियति हो गई है।

आज देश का कोई हिस्सा ऐसी वारदातों से महफूज नहीं रह गया। कुछ समय पहले तक कम से कम दक्षिण भारत आतंकवादी तपिश से कुछ हद तक बचा हुआ था, लेकिन अब वह अपवाद भी खत्म हो गया। समूचा देश बेरूत, बगदाद और काबुल की तरह थोड़े-थोड़े अंतराल पर दहशत से कांप उठने को अभिशप्त हो गया है। आतंक, असुरक्षा और बेबसी हमारी नई पहचान के रूप में उभरे हैं।

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की विश्वशक्ति, परमाणु शक्ति-संपन्न, आकर्षक विकास दर के साथ दुनिया की पांच विशालतम अर्थव्यवस्थाओं में एक और भविष्य के सबसे युवा और ऊर्जावान देश के लिए इससे अधिक शर्मनाक और क्या हो सकता है कि वह अपने निर्दोष और निरीह नागरिकों के जान-माल की रक्षा तक नहीं कर पा रहा है।

हर बार की तरह इस बार भी शोक संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं, मारे गए और घायल लोगों के परिजनों को आर्थिक मदद की पेशकश हो रही है, केंद्र और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की उम्मीदें और दावे भी किए जा रहे हैं, लेकिन सत्तारूढ़ दल एक-दूसरे के ऊपर इस हादसे की जिम्मेदारी थोपने से बाज नहीं आ रहे हैं।

ऐसे समय में जब आतंकवादी संगठन खुद वारदात करने से पहले ई-मेल भेजकर ललकार रहे हों और समूचे देश में उनका तंत्र कुटीर उद्योग की तरह विकसित हो चुका हो, तब केंद्रीय एजेंसियों की ओर से अमूर्त किस्म की रूटीन अग्रिम सावधानी भेजने का क्या मतलब रह जाता है।

बेशक, देश के हर नागरिक और हर स्थान को हमेशा सुरक्षा भी नहीं दी जा सकती है, लेकिन अब तक एक जैसी दर्जनों वारदातों की जांच-पड़ताल और पकड़े गए गुनहगारों से मिले सुराग वगैरह से क्या कुछ ऐसे ठोस निष्कर्ष भी नहीं निकाले जा सके कि कोई भरोसेमंद आतंक विरोधी प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जाए।

दोषारोपण और असहायता के मनोविज्ञान से बाहर निकले बिना आतंकवाद के विरुद्ध कोई कारगर और निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। ऐसे मानवता-विरोधी, सभ्यता-विरोधी बर्बर लोगों को मार भगाने का जज्बा और हौसला सिर्फ सुरक्षाबलों में ही नहीं, देश के हर नागरिक में होना चाहिए।

सिर्फ सरकार और सुरक्षाबलों के भरोसे बैठे रहने का अंजाम सामने है, इसलिए निकम्मी और खुद लाचार व्यवस्था का आसरा छोड़कर देश के हर नागरिक को अपनी हिफाजत के लिए अब आतंकवादी मंसूबों से लड़ने के लिए उठ खड़ा होना होगा।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: