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आतंकियों से पहले इन्हें खोजो, यंत्रणाएं दो

संपादकीय. kalpesh 9/11के एक माह बाद एक घटना घटी। एफबीआई को टिप मिली कि फिलाडेल्फिया और पिट्सबर्ग के बीच आतंकियों ने किसी ट्रेन में या स्टेशन पर कोई न्यूक्लियर डिवाइस रखी है, जो भयावह विस्फोट करेगी।

जैसा कि राष्ट्रपति चाहते थे- ये जानकारी सीधी उनकी टेबल पर पहुंचाई गई। उन्होंने सख्त कार्रवाई के आदेश दिए। सैकड़ों की तादाद में पुलिस फैल गई। कुछ न मिला। पता चला अफवाह थी। जॉर्ज बुश, लेकिन इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनका अगला आदेश था-अफवाह भी थी- तो शुरुआत कहीं से तो हुई होगी। पूरे अमेरिका में अलर्ट।

हर इंटेलीजेंस अफसर ने बुश की खिल्ली उड़ाई कि अफवाहों का क्या? कहीं से भी उड़ सकती हैं। पता चल भी गया तो क्या हो जाएगा? ठीक 24 घंटे बाद पता चल ही गया- सुदूर यूक्रेन में किसी बाथरूम में दो व्यक्ति मजाक कर रहे थे कि ‘आतंकी ऐसी कोई हरकत भी कर सकते हैं!’

उस दिन से बुश ने मानो मुहावरा ही गढ़ लिया। कोई भी आतंकी सूचना आती, तो उनका पहला सवाल जहरीली मुस्कुराहट के साथ होता- ‘आपने यूक्रेन के बाथरूम जैसे सारे स्थान तो जांच लिए हैं ना?’ इस खिल्ली के डर से अमेरिकी अफसरों ने यह सीख ली कि किसी भी सूचना पर पहले खूब खोज-बीन कर लो। जिससे अफवाहें न फैलें- कम से कम खुफिया या पुलिस तंत्र के स्तर पर तो बिल्कुल नहीं।

लेकिन जॉर्ज बुश ने जो नहीं किया- वही गलती हम भी कर रहे हैं। उस दिन अगर वे यूक्रेन में भद्दा मजाक कर रहे उन दोनों तत्वों को और भी सख्ती से उठवा लेते, भयानक यंत्रणाएं देते और दुनिया के सामने उन्हें आतंकियों का सहयोगी बताकर पेश कर देते तो शायद अमेरिका तत्काल प्रभाव से हर तरह की अफवाह से मुक्त हो जाता। भूलकर भी कोई ऐसा क्रूर मजाक कभी नहीं करता।

पिट्सबर्ग जैसा ही हड़कंप 28 जुलाई को जयपुर में मचा, 29 को अहमदाबाद, महेसाणा और वडोदरा में और फिर पाली जिले में मारवाड़ जंक्शन के पास। हर तरफ अफवाहें। पिट्सबर्ग से पाली तक पुलिस की भाषा एक ही जैसी है— किसी की शरारत है। किसकी शरारत? काहे की शरारत? यह तो दहशत है- आतंक है।

शायद उससे भी ज्यादा खतरनाक। क्योंकि मरना आसान है बजाय कि मौत के डर में जीने से। क्योंकि अहमदाबाद में तो अब पता है कि उनकी ताकत, हिम्मत और विश्वास को हिलाने की कैसी कोशिश हो चुकी है, लेकिन सूरत का हर रहवासी, हर पल, हर स्थान पर आतंकित होकर ही तो जी रहा होगा। जयपुर के मानसरोवर में हजार लोग क्यों इकट्ठा हो गए? रिजर्व बैंक तिराहे पर एक डिब्बा सबको डराता क्यों रहा? ताड़केश्वर के पास एक विक्षिप्त को देखकर हम सब पागल क्यों हो गए? स्पष्ट है- आतंक।

जैसे बुश ने यूक्रेन के भद्दा मजाक करने वालों को कठोर सजा नहीं दी, वैसे ही हमारे देश में भी न जाने कितने छोटे-बड़े यूक्रेन, कितने बाथरूम और कितने ही भद्दे लोग लाखों-करोड़ों नागरिकों पर न जाने कितने अत्याचार अफवाहों के माध्यम से दिन-रात कर रहे हैं, करते रहेंगे। यदि उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़कर, गिरफ्त में लेकर नाना प्रकार की यंत्रणाएं न दी गईं।

यही एक उपचार है- अफवाहों को रोकने का। कानून से हटकर। कानून की धाराओं में न बहकर। कानून का राज स्थापित करने के लिए। असाधारण उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए केवल अच्छा काम करने से काम नहीं चलेगा। असाधारण कर्म करने होंगे। आतंक की जड़ में जाकर ही उसे उखाड़ फेंका जा सकता है।

यदि भूलवश भी कोई दहशत फैलाता है-तो ये उसकी अंतिम भूल हो- ये सुनिश्चित करना होगा कानून के रखवालों को। और उसका हश्र जानकर, भूलकर भी कोई ऐसी भूल नहीं करेगा- यह तय है।





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Nishith
Wednesday, 30th Jul 2008, 15:46
The reason behined Banglore and Surat type blasts are too much depends on our police and inteeligence agencies. It was predicted that delhi and Indore may be next target of terrerist After knowing this what happened? here is a example of loyality of our police. I was returning from delhi to Gurgaon. At a cheking barrier police stopped me, ask for papers of bike, insurance etc. I only had Driving License. Cops told me that a challan of 2000 Rs will be charged, I told please keep my license I will show all documents tommorow But he told me "kharcha - paani dekar nikal jaao" Ek 100 ka note liya aur mere bag ki talashi tak nahi li aur jaane diya. Aise hi In same matter if any terrorist would be there containing RDX of bomb then also They will ask for 100 or 200 Rs and let him go. Why they didn't tried to search my bag? Aise hi jaane kitne checkpost par police terrorist ko chod deti hogi kyunki use talaashi se kya use to rishwat k 100\200 Rs chahiye. Delhi is not safe. Dont be satisfied with police and agencies.