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मैं उस देवता को पहचान न सकी

<128वीं जयंती पर विशेष.img src='http://www.bhaskar.com/2008/07/31/images/21.jpg' border='' align='left' alt='' hspace='10' vspace='10'>निधन से कुछ दिनों पहले प्रेमचंद ने पत्नी शिवरानी देवी को बताया कि उनके जीवन में एक तीसरी स्त्री भी थी। शिवरानी देवी ने कहा, मुझे पता है, चुप रहो। व्यक्तित्व और रिश्तों के सुंदर पहलुओं को उजागर करता शिवरानी देवी का संस्मरण पुस्तक प्रेमचंद घर में से..

एक दिन उन्हें रात में नींद नहीं आ रही थी। मैं उनके सोने के लिए कोशिश कर रही थी। आप बोले- मैं बीमार क्या पड़ा, तुम्हारे लिए खाना-पीना सब हराम हो गया। अपने सिर से हाथ खींचते हुए बोले- इधर आओ, जब नींद नहीं आती तो कुछ बात ही करें। मैं बोली- नहीं, आप सो जाइए। रात बहुत हो चली है। तब आप बोले- मैं घंटों से सोने और तुम्हें सुलाने की कोशिश में हूं, पर नींद आए तब न। देखो, तुमसे अपनी एक चोरी का हाल बताऊं। पर बात मुंह के बाहर निकालते झिझक होती है। मैं बोली- कैसी चोरी? तब बोले- उस बंगाली युवक को तुम्हारी जान में जो दिया था, सो तो दिया ही था। अपनी बीवी के कपड़े और जेवर भी उसने मेरी ही जमानत पर लिए थे। उस रुपए को तुम्हारी चोरी से मैंने अदा किया था। मैं बोली- आपने कैसे दिया? तब आप बोले- तुम्हीं सोचो, करता क्या? जो तुम्हारी चोरी से कहानियां लिखता था, उसी के पैसे उसे दे आता था।

आप बोले- अच्छा, एक और चोरी सुनो। मैंने अपनी पहली स्त्री के जीवन-काल में ही एक और स्त्री रख छोड़ी थी। तुम्हारे आने पर भी उससे मेरा संबंध था। मैं बोली- मुझे मालूम है।

यह सुनकर वे मेरी ओर देखने लगे। उस देखने के भाव से ऐसा मालूम होता था कि जैसे वे मेरे मुंह को पढ़ लेना चाहते हों। मैंने उनको अपनी तरफ देखते देखकर निगाह नीची कर ली। बड़ी देर तक वे गंभीर होकर मेरे चेहरे की तरफ देखते रहे। मैं शर्म से सिर झुकाए थी। बार-बार मेरे दिल के अंदर ख्याल हो रहा था कि इन बीती बातों को कहने का रहस्य क्या है?

कुछ देर के बाद बोले- तुम मुझसे बड़ी हो। मैं बोली- आज आपको क्या हो गया है? मैं बड़ी हो सकती हूं? तब आप हंसते हुए बोले- तुम हृदय से सचमुच मुझसे बड़ी हो। इतने दिन मेरे साथ रहते हुए भी तुमने भूलकर भी जिक्र नहीं किया। आप अपने आप बकने लगे- हे भगवान, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं कि मुझे कुछ दिन के लिए अच्छा कर दो। वे इस तरह प्रार्थना कर रहे थे और मैं चारपाई पर पड़ी-पड़ी रो रही थी। मैं और कुछ नहीं चाहता, इस बार अच्छा होना चाहता हूं। जो यह निष्कपट मेरी सेवा कर रही है, महज इसके लिए मुझको तू एक बार जिंदा कर। शायद वो रो भी रहे थे। मुझमें उस समय जड़ता आ गई। मेरा गला भर आया था। आंखों में आंसू भरे हुए थे।

जितनी ही कोशिश मैं रोकने की करती, आंसू और निकलते आ रहे थे। जिसका ऐसा स्नेही अलग हो रहा हो, उसे चैन कैसे मिले। मैंने चुपके से उठकर मुंह धोया, गला साफ किया। मुझे जगता समझकर बोले- मैं तुमसे कई दिनों से अपनी बातें बता देने का इच्छुक था। मैं बोली - मुझे इन बातों को सुनने की इच्छा नहीं है। आप बोले - कोई दूसरा समय होता तो शायद मैं भी नहीं कहता। मगर इस समय मैं तुमसे बिना इन बातों के कहे रह भी नहीं सकता था। मैं जितना ही तुम्हारे विषय में सोचता हूं, उतना ही मुझे क्लेश होता है। मैं चाहता हूं कि तुम मेरे पास से एक सेकेंड के लिए भी न हटो। न जाने मुझे इधर कई सालों से क्या हो गया है। तुम कहीं चली जाती हो तो मुझे कुछ भी नहीं अच्छा लगता।

मैं बोली- मैं तो जाती ही कहां हूं। फिर आखिर मैं ऐसा क्यों होता जा रहा हूं। यों पहले भी उनकी तबीयत ऐसी ही थी। बीमार होने पर वे पास से उठने न देते थे। शायद उनको अच्छा न लगता था। आज मैं उन बातों को सोचती हूं तो बराबर यही महसूस होता है कि मैं कितनी नीच और कायर हूं। जो मैं कुछ नहीं कर पाती। जो कभी एक दिन के लिए अलग होना न चाहता हो, उसके चले जाने पर भी उसी रफ्तार और उसी ढंग से मैं आज चली जा रही हूं। इससे ज्यादा और क्या कायरता तथा नीचता होगी। और एक दिन, दो दिन की बात नहीं है।

जिसने अपने दिल की सारी बातें कह दी हों, उसके लिए शेष रह ही क्या जात है? मैं उस महान आदमी को जरा भी न पहचान सकी। महान आत्माओं को पहचानने के लिए अपने में जोर चाहिए, ताकत चाहिए। फिर मैं समझती हूं, वह शक्ति आ ही कैसे सकती थी। मैं पहचानती ही कैसे। मैं उनके सामने थी ही क्या। उनके समान भला मैं कैसे हो सकती थी। वे अपने हृदय की सारी बातें एक-एक करके कह गए। मैं उस समय भी उन्हें पहचान न पाई। अब बाकी रहा क्या? अंधियारी रात और उसी रात में भटकना और अपने भाग्य को कोसना। हारकर यही मुंह से निकल जाता है कि मैं उस देवता को पहचान सकी।





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