|
प्रेमचंद ने फिल्मों में भी हाथ आजमाया। अजंता सिनेटोन कंपनी ने उन्हें 9 हजार रुपए सालाना वेतन पर रख लिया। जुलाई, 1934 में वे बंबई पहुंचे और फिल्म ‘मिल वर्कर’ की कहानी लिखी, लेकिन उसमें इतने बदलाव हुए कि मूल कहानी ही बदल गई। प्रेमचंद बड़े निराश हुए। अंतत: निराश होकर वे मध्य 1935 में बनारस लौट गए।
प्रेमचंद के निधन के बाद उनकी कई कृतियों पर फिल्में बनाई गईं। वर्ष 1938 में सुब्रमण्यम ने ‘सेवासदन’ उपन्यास पर फिल्म बनाई, जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिर ‘गोदान’ व ‘गबन’ पर वर्ष 1963 व 1966 में फिल्में बनीं। सत्यजीत राय ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977) व ‘सद्गति’ (1981) कहानी पर यादगार फिल्में बनाईं।
मृणाल सेन ने ‘कफन’ कहानी पर तेलुगु में ‘ओका ऊरी कथा’ फिल्म बनाई। वर्ष 1980 में उपन्यास ‘निर्मला’ पर टेलीविजन धारावाहिक बनाया गया। प्रेमचंद ने ‘मिल वर्कर’ फिल्म में अभिनय भी किया था। पंचायत के एक दृश्य में मुखिया की भूमिका निभाई।
महत्वपूर्ण वर्ष
1880 31 जुलाई को लमही में जन्म
1895 नौवीं कक्षा में पहला विवाह
1899 पहली नौकरी
1905 शिवरानी देवी से दूसरा विवाह
1९१५
‘सरस्वती’ पत्रिका में पहलीकहानी का प्रकाशन
प्रेमचंद के परिवार से हमें विरासत में साहित्य की रुचि और अच्छे संस्कार मिले। आज जब हर तरफ पैसा कमाने की होड़ और शोहरत के शॉर्ट कट हैं, संस्कारों की कीमत समझ में आती है।
अपूर्व (प्रेमचंद के पोते)
प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में वह मुकाम हासिल है, जो किसी और को नहीं। उन्होंने जिन रूढ़ियों और बुराइयों की आलोचना की, उन सबका असर हमारे परिवार और फिर हमारे ऊपर भी पड़ा।
रित्विक राय (प्रेमचंद के परनाती)
प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक हैं। उनके गद्य मे जो रवानी है, वह विरली है। कलम को फावड़े की तरह चलाने वाले उनके लेखन में बहुत ईमानदारी है। अपने चरित्रों को जितना लिखते हैं, उससे कहीं ज्यादा खुद बुनते हैं।
प्रसून जोशी (जाने-माने गीतकार)
कुछ चीजें हमेशा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक बनी रहती हैं। प्रेमचंद का लेखन ऐसा ही है। ढेरों होरी देश भर में बिखरे हैं, आत्महत्याएं कर रहे हैं। उनकी कहानियां, उसका महत्व देश-काल निरपेक्ष है।
गुलजार (प्रसिद्ध लेखक, गीतकार,फिल्म निर्देशक)
प्रेमचंद की कहानियों का कथानक आज भी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक है। स्त्रियों, दलितों और किसानों के सवाल आज भी जिंदा हैं। प्रेमचंद ने सिर्फ परिवार और वर्ण-व्यवस्था पर कोई चोट नहीं की है। राजेन्द्र यादव (वरिष्ठ साहित्यकार)