Breaking News 
bhaskar Web English


HomeNewsMetrosChandigarh Chandigarh

‘गांव में करवा दो मेरे तीन-चार शो’

बाय इन्वीटेशनमोहम्मद रफी की 28वीं बरसी 31 जुलाई को देशभर में मनाई जाएगी। अमृतसर जिले के गांव कोटला सुल्तान सिंह में रफी का जन्म हुआ था। उनके बचपन के दोस्त कुंदन सिंह ने दैनिक भास्कर के रीडर्स के लिए रफी के साथ बिताएं पलों को साझा किया।

मोहम्मद रफी मोहम्मद रफी को गांव में फीको कहकर पुकारा जाता था। पड़ोसी होने के कारण बचपन में फीको का ज्यादातर समय मेरे साथ गुजरा। मैं फीको से नौ महीने बड़ा हूं और वह मेरा सहपाठी था। गांव के एलीमेंटरी स्कूल से हमने एक साथ चौथी तक पढ़ाई की। पढ़ने-लिखने में वह ठीक-ठीक था। कई बार काम न करने या शरारतें करने के कारण स्कूल में डांट भी पड़ती थी।

जब पढ़ाई समाप्त हो गई तो वह तीन-चार महीने ऐसे ही बिना काम के घूमता रहा। फीको के पिता अली मोहम्मद खाना बनाने में माहिर थे और एक ही देग (बड़ा बर्तन) में सात रंग के चावल बना देते थे। फीको के गले में मां सरस्वती का वास था। ..या कहे तो आवाज उसकी गुलाम थी तो गलत नहीं होगा। एक बार हम कबड्डी खेल रहे थे तो उसने गीदड़ की आवाज से सभी को डरा दिया था। समय ने पासा पलटा और फीको मोहम्मद रफी के नाम से दुनिया में मशहूर हो गया।

कुंदन सिंह वह गांव के लिए बहुत कुछ करना चाहता था। 1956 में जब वह अमृतसर के एलेग्जेंड्रा ग्राउंड में शो करने आया तो मैं साथियों के साथ उसे मिलने गया। उसकी दिनचर्या इतनी व्यस्त थी कि तीसरे दिन एक सरदार जी ने मिलवाया। सरदार जी ने कहा, ‘तुहाडे पिंड तो कुज बंदे मिलन आए ने’। जब उसने मुझे देखा तो झट गले लगा लिया और कहा कि तुम गांववासियों के साथ मिलकर मेरे तीन-चार शो गांव में करवा दो। गांव के पास इतना पैसा हो जाएगा कि गांव-गांव नहीं, शहर बन जाएगा। पर उस समय के सरपंच गुरबख्श सिंह ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई।

रफी ने मुंबई में बिलकिस से दूसरी शादी रचाई तो उसने रफी को गांव की ओर रुख नहीं करने दिया। 1972 में उसका एक शो हुआ, जिसमें मैंने भी शिरकत की। लोगों ने रफी को उनकी पसंद का गीत गाने को कहा तो उसने पंजाबी गीत ‘लाके दंदा च मेखा, मौज बंजारा ले गया’ गाकर मन मोह लिया।

2004 में बिलकिस चंडीगढ़ आई, तो उसने संदेश भिजवाया कि वह मिलना चाहती है। चूंकि मेरी बहन का देहांत हुआ था, इसलिए मैं मिलने नहीं जा सका। 1937 में गांव छोड़ने से पहले फीको ने आम के एक पेड़ पर अपना नाम लिखा और कहा था कि जब भी मेरी याद आए तो यहां पर आना और मेरा नाम पढ़ना। ..आज वह पेड़ भी काट डाला गया। अब गांव में फीको की कोई यादगार नहीं बची। सरकार इस गांव में उसकी कोई यादगार बनाने के लिए रुचि नहीं दिखा रही।

(जैसा उन्होंने रणजीत कुमार को बताया)





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार
sunil
Thursday, 31st Jul 2008, 11:15
the detail provided by u on Mohd.Rafi Saheb birthday is excellent pl. provide some more detail.