दृष्टिकोण. पिछले कई वर्षो से राजनीतिक पार्टियों का यही सिद्धांत रहा है कि जीत के लिए अपनाए गए तौर-तरीकों की परवाह नहीं करनी चाहिए। लेकिन पिछले कुछ समय में बड़ी तेजी से अपनी व्यक्तिगत शुचिता की छाप छोड़ने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से यह कतई अपेक्षित नहीं था कि वे विश्वास मत को सही या गलत, किसी भी तरीके से हासिल करने के लिए इतनी आसानी से अपनी नीतियों से समझौता कर लेंगे।
यद्यपि, इस मामले में उनकी लालसा बेहद जबरदस्त थी और विश्वास मत को इस कदर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया कि कांग्रेस पार्टी ने सांसदों को फुसलाने के लिए हरसंभव तरीके अपनाए।
पार्टियों और सांसदों को लुभाने के लिए पैसा बहाए जाने का मसला ऐसा है, जिस पर अंतिम जवाब आना अभी बाकी है। ऐसे कई और भी मामले होंगे, जहां किस हद तक क्रॉस-वोटिंग हुई, इसकी जांच नहीं हुई। लेकिन यह कहीं ज्यादा स्थापित और प्रत्यक्ष तथ्य है कि समग्र रूप से पार्टियों को प्रलोभन दिए गए। यहां तक कि विश्वास मत से पहले ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन, जिनकी पार्टी के पास पांच महत्वपूर्ण वोट थे, बेहद उल्लासित मुद्रा में बता रहे थे कि उन्हें एक केबिनेट पद का प्रस्ताव मिला है, पार्टी के एक और सदस्य के लिए मंत्रालय और झारखंड में उनके पुत्र को उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात आई है।
कुछ महीने पहले जबसे सोरेन को हत्या के एक केस में राहत मिली है, वे केबिनेट में फिर से प्रवेश पाने के लिए हाय-तौबा मचाए हुए हैं। सब जानते हैं कि डॉ. सिंह ने इसका विरोध किया क्योंकि झामुमो के इस विवादास्पद नेता ने कई महीने जेल की सलाखों के पीछे बिताए हैं, लेकिन विश्वास मत ने सारा परिदृश्य बदल दिया। कांग्रेस तो यह दिखावा करके कि वह तो केवल अपने पूर्व सहयोगी को बहाल कर रही है, लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश करेगी। अब यह देखना बाकी है कि सोरेन जिस ‘कोयला’ मंत्रालय को पाने के लिए इतनी हाय-तौबा मचा रहे हैं, वह उन्हें मिलता है या नहीं।
फिर समाजवादी पार्टी का मसला है, जिसके समर्थन के बगैर यूपीए सरकार पूरी तरह डूब जाती। हालिया खबरों से संकेत मिलता है कि अब सपा भी मंत्रालय में जगह चाहती है। यद्यपि पूर्व में इसके प्रवक्ता अमर सिंह ऐसी किसी बात से इनकार कर चुके हैं। पार्टी की मांग तो यही थी कि उनके नेता मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जो केस चल रहे हैं, उन मामलों में कांग्रेस के आदेश पर सीबीआई अपनी रफ्तार धीमी कर दे और मुलायम की धुर-विरोधी उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ दबाव बढ़ा दे।
अब सीबीआई ने मायावती के बेहिसाब संपत्ति जमा करने के मामले में नवंबर की तारीख तय की है। इसके निहितार्थ यह हो सकते हैं कि चूंकि अब विश्वास मत जीत लिया गया है तो कांग्रेस आगे चलकर सपा नेताओं द्वारा दबाव डालने की स्थिति में अपने लिए विकल्प खुले रखना चाहती है। यदि पोस्टिंग और ट्रांसफर के मामलों में सपा अपना हक जताती है तो शायद कांग्रेस को कोई दिक्कत न हो लेकिन यदि वह अगले लोकसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे के दौरान तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाती है तो कांग्रेस कोई नया दांव चल सकती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि बाहरी मणिपुर के सांसद मणिचरण मयी ने विश्वास मत पर चल रही बहस के दौरान दावा किया कि प्रधानमंत्री राज्यों की सीमाओं के पुनर्निधारण पर विचार करने के लिए सहमत हो गए हैं। यह सदस्य ग्रेटर नगालैंड की मांग का हवाला दे रहे थे। यह एक संवेदनशील मसला है और यदि ग्रेटर नगालैंड बनाने की खातिर मणिपुर और असम से कुछ हिस्से लिए जाते हैं तो इन दोनों राज्यों में हिंसा भड़क सकती है। प्रधानमंत्री इस मसले पर कितने गंभीर थे, इस पर बहस हो सकती है लेकिन ऐसी कोई बात होना ही चिंता की बात है। कांग्रेस का डीएमके के साथ समझौता तो और भी अहम है।
विश्वास मत के तुरंत बाद कांग्रेस ने डीएमके की मांग को पूरा करने के लिए सेतुसमुद्रम मसले पर पैंतरा बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा दायर कर दिया। पूर्व में मनमोहन सरकार ने इस शीर्ष अदालत में दायर वह हलफनामा वापस ले लिया था जिसमें रामायण, भगवान श्रीराम और रामसेतु के अस्तित्व पर संदेह जताया गया था और जिस वजह से देश के लोग आंदोलित हो गए थे।
विश्वास मत के बाद बदले परिदृश्य में इसने बड़े ही चतुराईपूर्ण तरीके से प्राचीन धर्मग्रंथों और ‘पुराणों’ का हवाला देते हुए रामसेतु के अस्तित्व पर सवाल उठाया। देश के लाखों-करोड़ों हिंदुओं के लिए यह एक भावनात्मक मसला है और कांग्रेस डीएमके को संतुष्ट करने की खातिर आग से खेल रही है।
वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए परोक्ष रूप से भगवान राम और रामसेतु का उपहास ही किया। दूसरी ओर तीन जजों की बेंच ने बहस के दौरान इस बात का हवाला दिया कि 19वीं सदी में सेतुसमुद्रम चैनल को लेकर 9 योजनाएं बनाई गई थीं और 20वीं शताब्दी में इसमें पांच का और इजाफा हो गया लेकिन इनमें से किसी में भी रामसेतु को तोड़ने की बात नहीं कही गई। उनका तर्क था- ‘इसका मतलब है कि रामसेतु को नुकसान से बचाने के लिए पूरे प्रयास किए गए, संभवत: इसलिए क्योंकि यह आस्था का मामला है।’ बेंच ने आगे कहा कि जब विकल्प मौजूद थे तो तर्क और आस्था दोनों को एक साथ क्यों नहीं संभाला गया?
साफ है कि इस मसले पर कांग्रेस द्वारा देश के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं की पूरी तरह अवहेलना करना डीएमके से किए गए वादे का नतीजा था जो सेतुसमुद्रम कैनाल बनाने के लिए इस सेतु को तोड़ने को लेकर किसी समझौते के मूड में नहीं है। जब यूपीए सरकार के बाकी बड़े घटक दल विश्वास मत में सहयोग की अपनी कीमत मांगने लगेंगे तो ऐसा कतई नहीं माना जा सकता कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी लालू प्रसाद यादव का राजद और शरद यादव की एनसीपी इस अवसर को हाथ से जाने देंगे। यदि अब तक उन्होंने अपनी मांग नहीं रखी है तो आगे जरूर अपने पत्ते खोलेंगे।
इस सबने संसदीय लोकतंत्र को एक मजाक बना दिया है। इससे देशवासियों का सिर शर्म से झुक गया है। इस प्रकार जिस हद तक लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचा है और हमारे सरकारी तंत्र व राजनेताओं की गुणता के प्रति लोगों के मन में कहां तक संदेह का भाव जगा है,उसका आकलन नहीं किया जा सकता।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।