दृष्टिकोण. पिछले हफ्ते बेंगलूर और अहमदाबाद में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद की दो तस्वीरें आज भी दिमाग में घुमड़ रही हैं। एक तो अहमदाबाद के एक युवा लड़के की तस्वीर है जो बुरी तरह घायल है और अपने पिता व भाई को खोने के बाद रो रहा है।
दूसरी तस्वीर में बेंगलूर में बम डिस्पोजल स्क्वाड के सदस्य कांस्टेबल सुकुमार को एक मॉल के बाहर बम को निष्क्रिय करते हुए दिखाया गया है। पिछले हफ्ते घटी महत्वपूर्ण घटनाएं और इनके सबक इन दो तस्वीरों में सिमट गए हैं।
इनके सबक क्या हैं? बेशक इसका एक सबक तो यह है कि इन आपराधिक कृत्यों को अंजाम देने वाले आतंकियों ने मासूम लोगों को बुरी तरह चोट पहुंचाने, कइयों की दुर्दशा का कारण बनने और लोगों के मन में दहशत पैदा करने का अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। लेकिन इसका दूसरा सबक ज्यादा महत्वपूर्ण है और वह यह है कि आतंकी किसी भी तरीके का जोखिम पेश करें, इस देश की कानून-व्यवस्था की मशीनरी ऐसी मुश्किल परिस्थितियों को संभालने में सक्षम है। यदि दहशतगर्र्दो को मौत का भय नहीं है(जैसा उन्होंने अहमदाबाद के बम धमाकों से पहले भेजे गए ई-मेल में दावा किया) तो हमारे पुलिसकर्मी भी नहीं डरते, जो अपने लोगों की सुरक्षा के प्रति कटिबद्ध हैं।
जब भी कोई आतंकी वारदात होती है, इंटेलीजेंस की असफलता के बारे में काफी चर्चा की जाती है। असलियत यह है कि व्यावहारिक तौर पर घटना से पूर्व सटीक रूप से यह बता पाना नामुमकिन है कि कब और कहां आतंकी वारदात हो सकती है। इसके साथ-साथ हमारी खुफिया एजेंसियां एक निश्चित समयावधि में किसी आतंकी वारदात की आशंका का पूर्वानुमान और निर्धारण करने में बिलकुल सक्षम हैं। वे अक्सर ऐसी सूचनाएं पुलिस को देती भी हैं। लेकिन जहां एजेंसियां ऐसी जानकारियों को पुलिस तक पहुंचाने का दावा करती हैं, वहीं पुलिस ऐसी किसी विशेष जानकारी के मिलने से इनकार करती है।
हमें ऐसा तंत्र विकसित करने की जरूरत है जहां खुफिया एजेंसियों द्वारा किसी खास स्थान पर आतंकी हमले की आशंका जाहिर करने के बाद सुरक्षाबलों और जनभागीदारी के जरिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती प्रदान की जा सके। ऐसी आशंकाएं अपेक्षित घटना की तीव्रता या जानकारी की विश्वसनीयता के आधार पर श्रेणीबद्ध या कलर कोडेड हो सकती हैं।
अक्सर देखा जाता है कि मीडिया ‘रेड अलर्ट’ का हवाला देती है, लेकिन असलियत है कि हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। एक ऐसा मजबूत तंत्र जरूरी है जिसमें अलर्ट घोषित करने का अधिकार साफतौर पर परिभाषित हो और ऐसी स्थिति में जनता द्वारा सावधानी बरतने का और पुलिस द्वारा लागू किए जाने वाले कदमों का वर्णन हो। यह भी देखना होगा कि यदि इसका नवीनीकरण नहीं हो, तो अलर्ट निर्धारित दिनों के बाद स्वत: ही खत्म हो जाता है। यह जानते हुए कि नित्य चौकसी ही आजादी की कीमत है, कोई भी यथार्थ तौर पर हमेशा अलर्ट की अवस्था में नहीं रह सकता।
मौजूदा सुरक्षा व्यवस्थाओं में एक बड़ी कमी यह है कि सार्वजनिक स्थानों को असुरक्षित छोड़ दिया जाता है। मॉल्स और थिएटर्स में भले ही अपनी सुरक्षा व्यवस्थाएं हों, लेकिन सड़कों और दूसरे आम इलाकों, जहां लोग खुलेआम एक-दूसरे से मिलते हैं, को भारी पुलिसबल तैनात करने के अलावा किसी और तरीके से नहीं कवर किया जा सकता।
कम्युनिटी पुलिसिंग जैसी पहल संभवत: इसका हल हो सकती है। इंसानी खुफिया तौर-तरीकों को समुचित तकनीकी सहायता से पुष्ट करने की जरूरत है। कई राज्यों के पास जरूरी उपकरण तो हैं, लेकिन कभीकभार ये बगैर इस्तेमाल के रह जाते हैं। इसके लिए जागरूकता की कमी जिम्मेदार होती है या फिर तकनीकी विशेषज्ञों की कमी के चलते ऐसा नहीं हो पाता।
सार्वजनिक इलाकों में मॉनीटर्स व सेंसर्स लगाना काफी उपयोगी हो सकता है, जैसा कि जुलाई 2006 में हुए लंदन ब्लास्ट के संदर्भ में देखा गया जब सीसीटीवी से मिले फुटेज की मदद से एमआई-5 और लंदन पुलिस ने जल्द ही आरोपियों को खोज निकाला। हालांकि सीसीटीवी के जरिए हमेशा मॉनीटरिंग करना मुश्किल है। सीसीटीवी संभवत: ऐसे धमाके रोकने में उपयोगी न हों लेकिन धमाकों के बाद के परिदृश्य में कारगर साबित हो सकती हैं।
यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि अहमदाबाद बम धमाकों से ठीक पहले इंडियन मुजाहिदीन द्वारा मीडिया को भेजे गए ई-मेल में परोक्ष रूप से आत्मघाती हमले का हवाला दिया गया जिसमें लिखा था कि ‘हमें मौत से उतना ही लगाव है जितना तुम्हें जिंदगी से।’ वैसे भारत में राजीव गांधी और बेअंत सिंह हत्याकांड के बाद से कोई बड़ा आत्मघाती आतंकी हमला नहीं हुआ है।
वर्ष 2005 में बांग्लादेशी आतंकवादियों ने हैदराबाद के पुलिस कमिश्नर ऑफिस पर हमले के लिए शाहिद बिलाल के रूप में आत्मघाती हमलावर भेजा, लेकिन उनका यह प्रयास बिलकुल नाकाम रहा और इस हमले में सिर्फ बिलाल मारा गया। हालांकि जांचकर्ताओं को इस नतीजे तक पहुंचने में काफी समय लगा कि बिलाल सिर्फ इस आतंकी हमले का शिकार नहीं था, बल्कि खुद इस अपराध में लिप्त था। वैसे हमें हाल ही में काबुल में हुए एक आत्मघाती हमले में अपनी विदेश सेवा, सेना और पुलिस से जुड़े चार जांबाज लोगों को खोना पड़ा। अब हमें ऐसी शैतानी प्रवृत्तियों के खिलाफ सजग रहने की आवश्यकता है।
आखिरकार यही कहा जा सकता है कि हमें पुलिस का समर्थन करने और वह जिस कठिन परिस्थितियों में काम करती है, उसकी कद्र करनी जरूरी है। पिछले दिनों छठवें वेतन आयोग से जुड़े एक अधिकारी से जब पूछा गया कि पुलिसकर्मी जिस तरह से लगातार तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करते हैं, तो उनको इसका कोई मुआवजा मिलना चाहिए। इस पर उस अधिकारी का जवाब था कि ‘जो भी काम करता है वह लगातार तनाव में ही होता है।’
उस अधिकारी की यह टिप्पणी बहुत दुखदायी थी। हो सकता है अधिकारी का कहना सही हो, लेकिन मेरा मानना है कि एक आम आदमी जिसने बेंगलूर में सुकुमार और अहमदाबाद में राकेश पांडे जैसे पुलिसकर्मियों को अपने साथी नागरिकों की खातिर अपनी जान को जोखिम में डालते हुए देखा है, वही इसका फैसला बेहतर कर सकता है।
-लेखक ‘रॉ’ के पूर्व प्रमुख हैं।