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थम गई वाम की मजबूत आवाज

संपादकीय. कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का नहीं होना भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा नेता खो देना है, जो अपनी दलगत वैचारिक प्रतिबद्धताओं के प्रति दृढ़ रहते हुए भी समान विचारधारा वाले दलों की एकजुटता का सूत्रधार रहा हो।

कच्ची उम्र से ही राजनीति में सक्रिय सुरजीत स्वतंत्रता संग्राम से लेकर अनवरत संघर्षशील राजनीति के पुरोधा रहे। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के संस्थापक सदस्यों में से एक पोलित ब्यूरो के 1964 से सदस्य रहने वाले इस फक्कड़ कॉमरेड ने पार्टी महासचिव की हैसियत से तीसरे मोर्चे को जिस तरह से संगठित किया और गैर कांग्रेसी-गैर वाम पार्टी की सरकारें बनवाने में जो भूमिका अदा की, वह भारतीय राजनीति के लिए एक नया अध्याय रचने जैसा था।

वे वामपंथी विचारधारा के प्रति जितने कट्टर रहे, उतना ही लचीलापन उनकी राजनीति में रहा जिसके चलते सभी राजनीतिक दलों में उनका सम्मान था। गठबंधन की राजनीति में उन्हें चाणक्य कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं होगी, जिसकी आवाज को उनके विरोधी राजनीतिज्ञ भी नजरअंदाज नहीं कर पाते थे। कांग्रेस, भाजपा का विरोध करते हुए भी तीसरे मोर्चे की मजबूती के लिए इन दोनों दलों के टेक्टिकल सपोर्ट का उन्होंने बेहतरीन उपयोग किया।

जोड़-तोड़ की राजनीति के चलते कभी-कभी वे विवादों में भी घिरे, लेकिन उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता पर कभी कोई सवाल नहीं उठा। सांप्रदायिकता, साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद के खिलाफ उनका संघर्ष महज सैद्धांतिक न होकर व्यावहारिक धरातल पर भी कारगर रहा। भगत सिंह से लेकर किसान आंदोलन और राजनीतिक समीकरणों के लंबे सफर में उन्होंने अपनी ऐसी विशिष्ट पहचान बनाई, जो धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकजुटता की प्रतीक बन गईं।

भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को वे भलीभांति समझते थे तथा विसंगतियों के बीच संगति बैठाने में उन्हें महारत हासिल थी। देश में वामपंथी राजनीति के प्रति व्यापक स्वीकार्यता तथा जनाधार तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सीपीएम की जड़ों को मजबूती देने वाले पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में उनका शुमार था। वे पिछले कई महीनों से बीमार थे और हालिया राजनीतिक परिवर्तनों में उनकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी, लेकिन इस दौर में वे बड़ी शिद्दत से याद किए गए। यह तो नहीं कहा जा सकता कि यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर मायावती के साथ हो जाने के सीपीएम के फैसले को वे किस तरह प्रभावित करते, लेकिन सोमनाथ चटर्जी के साथ उभरे गतिरोध से वे पार्टी को संभवत: उबार लेते।

सुरजीत भारतीय राजनीति के एक हरफनमौला लेकिन बेहद संजीदा व प्रतिबद्ध राजनेता थे, जिनकी कमी तो पूरी नहीं की जा सकती, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली और संस्कार से भावी राजनीति को दिशा जरूर मिल सकती है।





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