संपादकीय. दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के दो-दिवसीय कोलंबो सम्मेलन की सबसे सार्थक बात आतंकवाद को एक सामूहिक खतरे के रूप में स्वीकार करना है।
समूचे क्षेत्र के मौजूदा माहौल को देखते हुए यह अनुमान तो पहले से ही लगाया जा रहा था कि इस बार यह मुद्दा चर्चा में जरूर रहेगा, लेकिन पाकिस्तानी रवैये के पिछले अनुभवों को देखते हुए यह आशंका भी हो रही थी कि यदि आतंकवाद और उसके बहाने पाकिस्तान की ओर अंगुलियां उठेंगी तो संभव है कि दक्षेस का यह सम्मेलन पाकिस्तानी प्रतिक्रिया से विफलता की ओर चला जाए।
संतोष की बात है कि इस बार पाकिस्तान ने कोई नकारात्मक रूप नहीं दिखाया और इस मामले में भुक्तभोगी देशों की चिंताओं से सहमति जताते हुए सहयोग का आश्वासन भी दिया।
निश्चय ही यह पंद्रहवां दक्षेस सम्मेलन इस बात के लिए जाना जाएगा कि आतंकवाद पर पहली बार इसके सभी सदस्य देश आमराय बनाने में कामयाब हुए हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि है। दक्षेस के मंच से भारत, अफगानिस्तान और श्रीलंका जैसे महत्वपूर्ण देशों ने खुलेआम इस मुद्दे को उठाया।
हामिद करजई ने तो पाकिस्तान पर इसको शह देने का आरोप भी लगाया, फिर भी पाकिस्तान ने इस पर बिदकने की बजाय खुद को भी इसका भुक्तभोगी बताकर सबको चौंका दिया। उसके रवैये में आए इस बदलाव की वजह अमेरिकी दबाव है या क्षेत्र में अलग-थलग पड़ने की आशंका या फिर अपने घरेलू मोर्चे पर जेहादियों से जूझना, यह तो साफ-साफ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक सकारात्मक बदलाव जरूर है। आखिर उसकी नेता बेनजीर भुट्टो भी आतंकवाद की ही भेंट चढ़ी हैं। खुद राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर कई बार आतंकी हमला हो चुका है।
इसलिए बेनजीर की पार्टी से ताल्लुक रखने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री सैयद यूसुफ रजा गिलानी पर आतंकवाद से निपटने का आंतरिक दबाव कम नहीं है। यदि वे इस लड़ाई को ईमानदारी से लड़ना चाहेंगे तो दक्षेस के सभी देशों का सहयोग-समर्थन उन्हें मिलेगा, लेकिन यदि वे क्षेत्र के दूसरे देशों को प्रकारांतर से परेशान करने के लिए आतंकवाद के भस्मासुर को इस्तेमाल करने की चालाकी दिखाएंगे तो वह दिन दूर नहीं जब खुद उनका अपना मुल्क भी पूरी तरह इस मानवता-विरोधी व्याधि की गिरफ्त में चला जाएगा।
गिलानी खुद भी इस कड़वी हकीकत से अनजान नहीं हैं कि इस वक्त वे आतंकवाद को लेकर दोहरे(अंदरूनी व बाह्य) दबाव में हैं। इसलिए समझदारी इसी में है कि सभी अमन-पसंद और सभ्य क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ मिलकर इसका मुकाबला किया जाए। दक्षेस की भी यही प्राथमिकता और सार्थकता है।