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बगैर फीस के हो रहा इलाज

बिलासपुर. जड़ी-बूटियों से इलाज और उसके बदले लिया जाता है, एक नारियल और चार अगरबत्ती। ईश्वर के प्रति आस्था और जड़ी-बूटियों के प्रति विश्वास के दम पर इलाज शुरू कर दिया जाता है।

यहां बात हो रही है वनांचलों में बैगा-आदिवासियों की बीमारियों का इलाज करने वाले वैद्यों की। वर्तमान में जहां मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है। लाइलाज रोगों का भी बड़ी आसानी से उपचार हो रहा हैं। ऐसे में अनपढ़ और सीधे-साधे वैद्य भी डाक्टरों से कम नहीं है। उनके द्वारा वनांचलों में असाध्य रोगों का इलाज जड़ी-बूटियों से किया जा रहा है। दवा का असर नहीं होगा इस भय से वनांचलों के वैद्य मरीजों से फीस भी नहीं लेते।

दैनिक भास्कर ने ऐसे ही कुछ वैद्यों से चर्चा की, तो कई बातें पता चली। त्रिवेणी भवन में आयोजित पांच दिवसीय वैद्य प्रशिक्षण कार्यशाला में खुड़िया से आए मुसुराम कंवर पिछले तीस सालों से लोगों की सेवा कर रहे हैं। शरीर के किसी भी अंग की हड्डी टूटने पर लोग वहां इलाज कराने आते हैं। आज तक उनके घर से कोई निराश नहीं लौटा।

मरजाद बेल, गुरुथ, गुरंज सहित अन्य जड़ी-बूटियों की मदद से वे जल्दी से जल्दी टूटी हुई हड्डियां जोड़ देते हैं। सभी प्रकार के वात मसलन गठिया, फुलनी, झुनझुनी और सुखा, उनके द्वारा ठीक किए जाते हैं। उनके द्वारा किसी से कोई फीस नहीं ली जाती।

कोरबा जिले में लेमरु ग्राम पंचायत के ग्राम आरेताल में रहने वाले सुनाराम मंझवार पैर में सूजन, ब्लड प्रेशर, कान दर्द तो, केऊबहरा में रहने वाले टिकैतराम शरीर के किसी भी अंग में होने वाले दर्द की दवा देते हैं। सुनाराम कहते हैं कि पैर या हाथ में सूजन होने पर उस इलाके में बहुतायत मात्रा में मिलने वाले छेड़ा पत्थर को थोड़ा सा पीस कर मरीज को पिला दिया जाता है।

टिकैतराम के मुताबिक उन्होंने अब तक हजारों लोगों का इलाज किया हैं, लेकिन कभी भी किसी से एक रुपया नहीं लिया। बीमारी ठीक होने पर लोग अपनी इच्छा से मुर्गा या खोवा दे जाते हैं। इलाज शुरू करने के पहले मरीज से नारियल-अगरबत्ती लेते हैं और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर देते हैं।

खैरा-जल्दा में रहने वाले लक्ष्मण सतनामी पिछले 25-30 वर्षो से लकवा, गेस्टिक, दमा, क्षयरोग सहित विभिन्न बीमारियों का इलाज करते हैं। वे इंद्रावन जड़ी, सुआटोटी, बादिल झाड़, भुइलिन, नहरबेला, पाढ़िन जड़ सहित अन्य जड़ी-बूटियों की मदद से मरीजों को ठीक करते हैं। काफी दूर-दूर से लोग उनसे इलाज कराने आते हैं और वे किसी को निराश नहीं करते। वे मरीजों को तेल व नमक से परहेज करने कहते हैं।

बिल्हा के पास भटगांव में रहने वाले मोहनलाल कौशिक नाड़ी वैद्य। इनका कहना है कि नाड़ी छूकर ही वह बीमारी के बारे में पता लगा लेते हैं और उसका इलाज भी जड़ी-बूटियों के माध्यम से करते हैं। पाली क्षेत्र के जाली से आए मनसा राम यादव मनुष्यों के अलावा पशुओं का इलाज भी करते हैं। पशुओं में होने वाली गजरा बीमारी भी उनके द्वारा ठीक की जाती है।

खतरे में हैं आयुर्वेद: दीवान
वैद्य प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ करने के पश्चात विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान ने कहा कि आयुर्वेद के प्रति लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। पारंपरिक वैद्यों की कमी और दवाओं के निर्माण में बरते जाने वाली लापरवाही के चलते ऐसा हो रहा हैं। उन्होंने केरल राज्य का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां आयुर्वेदिक पद्धति काफी प्रचलित है, क्योंकि वहां लोग दवाइयों का निर्माण खुद करते हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ हर्बल स्टेट के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, इसलिए यहां वनौषधियों पर गहन शोध की आवश्यकता है।

पंडित सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति डा. टीडी शर्मा ने विश्वविद्यालय द्वारा वनौषधियों के संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। इस दौरान आयुर्वेद विभाग के डा. विमल शर्मा, डा. दिलीप राय, डा. ओमनारायण तिवारी, सुमन शर्मा, केडी भट्ट, मीडिया प्रभारी ऋचा शर्मा सहित बिलासपुर संभाग से आए चालीस से भी अधिक वैद्य मौजूद थे।





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