दृष्टिकोण. दों दिन, दो जगह सिलसिलेवार बम धमाके। इसका पहला निशाना बनी देश की आईटी केपिटल बेंगलूर सिटी जबकि निशाने पर दूसरा शहर रहा अहमदाबाद जो संयोग से देश की आतंकवादी-विरोधी विचारधारा का गढ़ है। इन दो घटनाओं के बाद हीरों की नगरी सूरत में दो दर्जन से अधिक जिंदा बम बरामद किए गए।
इस पर भी पुलिस के घावों पर नमक मलते हुए ‘सिमी’, ‘हूजी’, ‘इंडियन मुजाहिदीन’ जैसे आतंकवादी संगठनों ने मीडिया के साथ-साथ कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को भेजे गए ई-मेल में कहा कि उन्होंने तो सिर्फ यह जताने के लिए बम प्लांट किए थे कि वे कितने ताकतवर हैं। ई-मेल्स के जरिए उनका यह उद्देश्य पूरा हो गया।
इस घटनाक्रम के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत सेना को बुलाया और सीधे घटनास्थलों का रुख किया। कोई भाषणबाजी नहीं, गोधरा हत्याकांड की तरह कोई प्रतिकार की अपील नहीं। जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सामाजिक ताने-बाने को बरकरार रखने की जरूरत और दोषियों को न बख्शने के वही अपने पुराने जुमले दोहराए। लोगों के यह सुन-सुनकर कान पक चुके हैं कि ‘आतंकवाद का किसी खास धर्म से कोई लेना-देना नहीं है’ और ‘कोई धर्म आतंकवाद या नफरत की शिक्षा नहीं देता।’ बहुसंख्यक आबादी के इस सम्यक नजरिए में कुछ तो बात है जो अपनी ही बिरादरी के इतने सारे लोगों की जान जाने के बावजूद उद्वेलित नहीं होते। ऐसा नहीं है कि इनमें से कुछ लोग आंदोलित नहीं होते या इससे उनका मन खट्टा नहीं होता। वे गोधरा नरसंहार के प्रतिशोध में ऐसा कर चुके हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि यही पीड़ित बहुसंख्यक आबादी की दुनिया भर में गोधरा कांड को अंजाम देने वालों से भी ज्यादा निंदा की गई।
बहुसंख्यक आबादी यह महसूस करती है कि भले ही कोई भी धर्म खुलेआम आतंकवाद की शिक्षा नहीं देता, लेकिन जो लोग भी आतंकवादी गतिविधियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े पाए गए, वे सब किसी खास अल्पसंख्यक समुदाय से ही आते हैं। हालांकि इसके बारे में बात करने का यह कोई अच्छा तरीका नहीं है चूंकि उग्र सापंद्रायिकता खुद आतंकवाद से भी बुरी है।
बहुसंख्यक आबादी इस बात से भी अनजान नहीं है कि साजिश करने वाले समुदाय ने खुद को गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और रूढ़िवाद की आत्म-निर्मित बस्ती के भीतर समेट रखा है जो हर तरह के खुलेपन से दूर रहती है और जहां गुप्त साजिशों और छल-कपट को पनाह मिलती है। जबकि इस बस्ती के बाहर की परंपराएं बिलकुल अलग हैं।
उनकी सहिष्णुता और आत्म-त्याग की भावना को उच्च नैतिक मूल्यों में गिना जाता है। यहां के लोगों को इसमें गौरव की अनुभूति होती है कि वे बहु-वर्गीय, बहु-नस्लीय समाज हैं और उन्हें सच्चे मायनों में इस बात पर गर्व है कि उनके राष्ट्र में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और यहां तक कि सत्ताधारी पार्टी/गठबंधन की अध्यक्ष भी बहुसंख्यक आबादी से इतर हो सकते हैं। यहां सभी विचारधाराएं साथ चल सकती हैं। इसके विपरीत दूसरे ख्ांड में ऐसा खुलापन नहीं है।
इस तरह दो विरोधी विचारधारों के सह-अस्तित्व के चलते यहां कई महान संत हुए जिन्होंने सहिष्णुता और सहजीविता का उपदेश दिया। यह बहुसंख्यकों की आत्म-त्याग की क्षमता और शांतिप्रियता ही थी जिसने नेहरू जैसे नेताओं को धर्मनिरपेक्षवादी के भेष में बहुसंख्यक आबादी के गले में जबरन हिंदू कोड बिल ठूंसने की इजाजत दी जबकि अल्पसंख्यक समुदाय की कुछ बर्बरतम प्रथाओं में थोड़ा-बहुत सुधार करने की कोशिश तक नहीं की गई।
सहिष्णुता बेशक ऐसी भावना है जिसे सराहा जाना चाहिए। कोई भी जो यह मानता है कि जन्म के साथ ही उसे वह सब कुछ मिल गया है जो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है, वह केवल धर्माध ही हो सकता है। और धर्माधता एक विकार है। लेकिन क्या यह मानना कि आपके पास जो कुछ भी है वह तिरस्कार करने लायक है, अपने आप में एक बदतर विकार नहीं है?
पिछली शताब्दी से यहां नागरिक समाजों में टकराव देखा जा रहा है। महात्मा गांधी जिन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का जीवन बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी, प्रतीकात्मक ढंग से इस टकराव का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अल्पसंख्यक समुदाय के बड़े हिस्से की कट्टर मानसिकता को बदलने के लिए आर्थिक सुधारों को भी अभी लंबी दूरी तय करनी होगी। लेकिन इस तरह की कार्रवाई की भी अपनी सीमाएं हैं।
अंग्रेज अपनी धूर्त और प्रभावी नीतियों के इस्तेमाल के जरिए भारत को ‘कानून-व्यवस्था’ के दायरे में लाने में कामयाब रहे। उन्होंने पूरी दुनिया में अपना साम्राज्य बनाए रखने के लिए कमोबेश इसी नीति का इस्तेमाल किया। ‘गन बोट डिप्लोमैसी’ में मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं की गई।
इसने कानून और व्यवस्था की संस्थापना को बुराई और अच्छाई के बीच मैत्री मैच की तरह नहीं लिया। यदि दक्षिण-पूर्व एशिया के सुदूरवर्ती द्वीपों पर एक भी ब्रिटिश नागरिक को चोट पहुंचाई जाती तो इसके प्रतिशोध में सेना के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के जरिए दमनचक्र चलाया जाता जिससे लोगों में कानून के प्रति भय हो जाता।
किसी भी जिम्मेदार पुलिस ऑफीसर से पूछिए जो किसी आतंकी वारदात की जांच टीम का इंचार्ज रहा हो कि इस बात की पूरी तरह परवाह करने के बाद जिसे ‘मानवाधिकार’ कहा जाता है, आतंकवाद से निपटना संभव है? उसका जवाब यही होगा कि यदि कोई स्टेट के खिलाफ हथियार उठाता है तो वह स्वत: ही नागरिक के तौर पर खुद से बर्ताव किए जाने के सारे अधिकार खो देता है और वह ज्यादा से ज्यादा युद्धबंदियों से संबंधित जेनेवा कंवेंशन के तहत कुछ विशेषाधिकारों का दावा कर सकता है।
कई गणमान्य नेताओं का अब भी यह कहना है कि आतंकवाद एक ‘छद्म युद्ध’ है। यदि ऐसा है तो इस समस्या का निदान आतंकवाद के स्रोत चाहे वह कहीं भी हो, उसके खिलाफ ‘गन बोट डिप्लोमैसी’ जैसी किसी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई में ही निहित है या फिर आतंकी वारदात संबंधी जांच-पड़ताल को सामूहिक शत्रुता के हिस्से के तौर पर लेना होगा जहां दया की कोई गुंजाइश नहीं होती। मौजूदा एकतरफा भलमनसाहत हमेशा जारी नहीं रह सकती।
सवाल यह है कि क्या आत्म-त्याग की परंपराओं में पली-बढ़ी पीड़ित बहुसंख्यक आबादी वाला यह देश इतना साहस कर सकता है कि अपने इस चोले को उतारकर फेंक सके ताकि इस दुनिया के समक्ष आजादी और सहिष्णुता की परंपरा कायम रह सके?
- लेखक राज्यसभा सदस्य और शेतकरी संगठन के संस्थापक हैं।