रोहतक. भारत की आन-बान-शान तिरंगे का रूप 90 साल तक बदलता रहा था। आजादी से पूर्व स्वतंत्रता सेनानियों ने राष्ट्रीय ध्वज को उसका हक दिलाने के लिए राष्ट्र के ऊपर थोपे गए अंग्रेजी झंडे यूनियन जैक के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया था। उसी संघर्ष का नतीजा है कि आज तिरंगा राष्ट्र की स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता और अस्मिता का प्रतीक है।
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के इतिहास विभाग के सीनियर प्रोफेसर डा. बीडी यादव के मुताबिक यूनियन जैक के विरुद्ध राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण का पहला प्रयास वर्ष १८५७ में स्वतंत्रता संग्राम के समय हुआ। मगर संग्राम की विफलता के साथ ही उसका प्रचलन भी समाप्त हो गया। वहीं, जब लार्ड लुई माउंटबेटन ने तीन जून १९४७ को ब्रिटिश सरकार के निर्णय के अनुसार भारत को स्वतंत्र कर देने की घोषणा की, तब स्वतंत्र भारत के ध्वज के विषय में सुझाव देने के लिए २2 जून १९४७ को कमेटी बनाई। कमेटी ने तिरंगे को अंतिम रूप दिया गया।
तिरंगे का संक्षिप्त इतिहास
वर्ष १९क्4 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने एक राष्ट्रीय ध्वज बनाया। इस वर्गाकार ध्वज को १९क्६ में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में प्रदर्शित किया गया। लाल रंग के इस ध्वज के किनारों पर आठ कमल के फूल बने थे और बीच में वंदेमातरम लिखा हुआ था। 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने एक ध्वज बनाया था। यह ध्वज पहले ध्वज के काफी समान था, हालांकि इसमें आठ की जगह सिर्फ एक कमल और सात सितारे थे, जो सप्त ऋषियों के प्रतीक थे। इस ध्वज को बर्लिन की सोशलिस्ट कॉन्फ्रेस में प्रदर्शित किया गया था।
आंध्र प्रदेश के पिंगले वैंकया नामक युवक ने १९१६ के आसपास भारत के राष्ट्रीय झंडे के निर्माण और प्रचार-प्रसार के लिए भारतीय राष्ट्रीय झंडा मिशन बनाया।
1917 में होमरूल आंदोलन के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने एक ध्वज तैयार किया था। इसमें लाल रंग की पांच और हरे रंग की चार आड़ीं पट्टियां थीं। साथ ही सात सितारे और बायीं ओर यूनियन जैक बना था।
१९२१ में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की अहमदाबाद में वार्षिक बैठक हुई। इसमें चरखे की आकृति वाला तिरंगा फहराया गया। असहयोग आंदोलन में इस झंडे की लोकप्रियता बढ़ती गई।
1931 में एक संकल्प पारित किया गया, जिसमें तिरंगे को राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकृत किया गया। इसके बीच में चरखा था। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भी 1931 के ध्वज को स्वतंत्र भारत के ध्वज के रूप में मान्यता दी। इसके तीनों रंग तो वहीं रहे, लेकिन इसमें चरखे के स्थान पर अशोक चक्र को रखा गया।