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समरसता कायम करना बड़ी चुनौती

दृष्टिकोण.इस देश के आतंकी नक्शे पर हंसाबेन मकवाना संभवत: फुटनोट में भी शामिल नहीं होगी। अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल के बर्न वॉर्ड में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही इस 50 वर्षीय महिला का दृढ़ चेहरा बताता है कि उसने जीवन की आस नहीं छोड़ी है। उसकी केवल एक ही इच्छा है:- उसी अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में काम पर वापस लौटना जहां शहर में हुए 21 बम धमाकों में सबसे जबरदस्त धमाका हुआ था।

उसकी आवाज में कोई नफरत नहीं, कोई दोषारोपण नहीं, जबकि उसके पास गुस्सा होने के पर्याप्त कारण हैं। आखिरकार, उसके पति ने उसे अस्पताल के गेट पर छोड़ा ही था कि बम धमाका हुआ, जिसमें दोनों पति-पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गए। आखिर बीमारों और घायलों की आश्रयस्थली किसी अस्पताल को लक्ष्य बनाने से ज्यादा पाशविक कृत्य और क्या हो सकता है? अस्पताल में युवा सर्जन और रेसीडेंट डॉक्टर, जिनके सहकर्मी इस धमाके में मारे गए, लोगों की जिंदगी बचाने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं। हंसाबेन की तरह उनका धैर्य और साहस भी काबिले-तारीफ है।

वास्तव में धमाकों के बाद अहमदाबाद के लोगों ने जिस कदर संयम और धैर्य का परिचय दिया, उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह वही शहर है, जो गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में 800 से ज्यादा लोगों की जिंदगी छीनने का गवाह बना था? क्या हिंसा और प्रतिहिंसा के घाव आखिरकार भर गए?

दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। कुछ लोगों के आधार पर सामूहिक सद्भाव का अनुमान लगाना गलत हो सकता है। ऐसे पीड़ितों की कहानियां, जिनकी वेदना धार्मिक विभेदों से परे है, और खास तौर पर एक ऐसे शहर से जहां बदला लेने की आवाज नहीं उठी, टीवी के लिए अच्छा मसाला तो बन सकती हैं। लेकिन टीवी इमेज की ताकत इस कड़वी सच्चई को छिपा नहीं सकती कि अहमदाबाद ऐसा शहर है जो भौतिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर नफरत की दीवारों से विभाजित है।

मिली-जुली आबादी की जगह अंतर-सामुदायिक संबंधों के लगातार सिकुड़ते दायरे वाली धार्मिक बस्तियों ने ले ली है। वर्ष 2002 के दंगों के बाद दोनों संप्रदायों के कई परिवार ‘सुरक्षित’ इलाकों की ओर कूच कर गए, जहां सुरक्षा का आशय है उनकी अपने सह-धर्मियों के साथ रहने की इच्छा। जहां विनियोजन के स्पष्ट नियमों के साथ अदृश्य ‘सीमाएं’ तैयार हो र्गई: किसी भी समुदाय के सदस्य दूसरों के इलाके में तब तक प्रवेश नहीं करेंगे, जब तक कि बहुत जरूरी न हो।

आप मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विधानसभा क्षेत्र हिंदू बहुल मणिनगर में जाएं और आपको नाराजगी भरा गुस्सा देखने को मिलेगा। यहां पांच बम धमाके हुए। वहां बदले के लिए खुले तौर पर कोई चीख-पुकार नहीं है। विहिप के मुखिया प्रवीण तोगड़िया ने अपने गुस्से का रुख जम्मू और रामसेतु की ओर कर दिया है। लेकिन कानून-व्यवस्था से जुड़ी मशीनरी के प्रति बेचैनी बढ़ती जा रही है जो आतंक के सौदागरों से निपटने में अक्षम साबित हो रही है।

इस विभाजन के दूसरी ओर तीन लाख की सघन आबादी वाला इलाका जुहापुरा है जिसे अक्सर ‘मिनी पाकिस्तान’ के तौर पर निरूपित किया जाता है। इसकी पथरीली सड़कों में भी स्टेट के प्रति गुस्सा है, लेकिन कुछ अलग किस्म का। विशेषकर युवा मुसलमानों में लगता है कि गंभीर शिकायत का भाव बढ़ रहा है। वे इस बात को मानते हैं कि स्टेट अन्यायी और अलगाववादी है। उनकी आम शिकायत है कि ‘मुस्लिम वर्ग को कोई नौकरी नहीं दी जाती’।

इस गुस्से और पराएपन की हांडी में हमेशा तनाव उबलता रहता है। अतीत में अहमहदाबाद का सांप्रदायिक विवाद का खूनी इतिहास पत्थरबाजी या छुरेबाजी तक ही सीमित था। 2002 ने सब कुछ बदल दिया: छोटे-छोटे बच्चों को आग में झोंक दिया गया, गर्भवती महिलाओं के गर्भ गिरा दिए गए और कुल मिलाकर हिंसा ने क्रूर रूप धारण कर लिया। और अब आतंकवादी एक और पैशाचिक आयाम लेकर आए: ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए सटीक बम धमाके करना। हालांकि हमें इस सच्चई को स्वीकार करना ही होगा कि आतंकवाद में कोई अनदेखा ‘विदेशी’ हाथ नहीं है, वरन आपके आस-पास ही रहने वाला धार्मिक उन्मादी शख्स हो सकता है। इसमें क्या संदेह है कि 70 मिनट में 21 बम धमाकों को केवल एक गहरा स्थानीय नेटवर्क ही अंजाम दे सकता है।

देश के तेजी से बढ़ते शहरों में से एक इस शहर में सामाजिक ताने-बाने को फिर स्थापित करना राज्य और समाज के लिए बड़ी चुनौती है। दंगों के बाद कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने पर जोर दिया। इनमें से कई सरकार के इशारों पर चलने वाली मशीनरी से टकराव के बावजूद साहस के साथ अपनी मुहिम में जुटी रहीं, लेकिन कुछ संस्थाएं राजनीतिक सुधारीकरण के जाल में उलझते हुए अल्पसंख्यक समुदाय का सामना करने के प्रति अनिच्छुक नजर आईं, इस कड़वी सच्चई को जानने के बावजूद कि यह आतंक की शिकार और साजिशकर्ता दोनों है।

आदर्श रूप से यह भूमिका राज्य को निभानी चाहिए लेकिन सच्चई यह है कि गुजरात सरकार को अब भी पक्षपाती और अल्पसंख्यक-विरोधी माना जाता है। कुछ आलोचनाएं अनुचित हो सकती हैं। बम धमाकों के बाद मोदी संयम की प्रतिमूर्ति नजर आए। आखिरकार, यदि मोदी आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर खुद को किसी बड़ी भूमिका में देखना चाहते हैं तो उन्हें 2002 के दंगों के बाद बनी अपनी छवि से पीछा छुड़ाना होगा।

और हां, मोदी को उन लोगों के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ने के लिए और भी काफी कुछ करना होगा जिन्हें वास्तव में राज्य द्वारा हाशिए पर डाल दिया गया है। धमाकों के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवादियों को हराने का केवल एक ही तरीका है कि गुजरात के आर्थिक विकास की रफ्तार को और बढ़ा दिया जाए। वे सही हो सकते हैं। लेकिन तड़क-भड़क वाले मॉल्स और चिकने राजमार्र्गो के बीच यह भी एक कड़वी सच्चई है कि जुहापुरा में पहली एटीएम मशीन चार हफ्ते पहले ही लगी है और मुख्यमंत्री ने पिछले सात वर्र्षो में एक बार भी इस क्षेत्र का दौरा नहीं किया। साफ है कि ‘वायब्रेंट गुजरात’ को सच्चे तौर पर सार्थक होने के लिए अहमदाबाद की ‘सीमाओं’ को पाटने की जरूरत है।

Rajdeep.sardesai@network18online.com - लेखक आईबीएन नेटवर्क के एडिटर इन चीफ हैं।





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नीरज दीवा
Thursday, 7th Aug 2008, 18:32
सही लिखा है राजदीप भाई.. घृणा की बुनियाद पर राजनीति की रोटी सेंकी जाती है. जुहापुरा जैसे इलाक़ों में फैला असंतोष आने वाले दिनों के लिए घातक होगा. हम ही ग़लत व्यवस्थाएं दे रहे हैं और हमको ही भयावह भविष्य का सामना करना होगा. थू है ऐसी राजनीति पर.