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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior शिवपुरी. चार सूत्रीय मांगों को लेकर पिछले नौ दिनों से कलेक्ट्रेट के सामने धरने पर बैठे जन स्वास्थ्य रक्षक एवं आशा कार्यकर्ताओं ने बुधवार से भूख हड़ताल शुरू कर दी है।
अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चल रहे जन स्वास्थ्य रक्षक और आशा कार्यकर्ताओ का कहना है कि उनका आंदोलन मांगे पूरी न होने तक जारी रहेगा। हड़ताल से अब ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं पर भी प्रतिकूल असर पड़ने लगा है। विदित हो कि मप्र जन स्वास्थ्य रक्षक संघ भोपाल के निर्देश पर पूरे प्रदेश के जन स्वास्थ्य रक्षक और आशा कार्यकर्ता अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चल रहे हैं। शिवपुरी जिले के भी जनस्वास्थ्य रक्षक और आशा कार्यकर्ता भी काम-काज बंद कर 29 जुलाई से हड़ताल में शामिल हो गए। आठ दिन तक तो हड़ताली कर्मचारियों ने कलेक्ट्रेट के सामने धरना दिया, लेकिन जब सरकार उनकी मांग की ओर गंभीर नहीं हुई तो फिर उन्होंने आंदोलन को और तेज करते हुए छह अगस्त से भूख हड़ताल शुरू कर दी।
संगठन के जिला उपाध्यक्ष रामकिशन सोनी ने बताया कि अगर हमारी मांगे पूरी नहीं हुई तो हम भूख हड़ताल को और चरम सीमा पर ले जाएंगे। इसके बाद भी मप्र सरकार जन स्वास्थ्य रक्षकों और आशा कार्यकर्ताओं की ओर ध्यान नहीं देती तो उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा। उन्होने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अन्य कर्मचारियों को तो दिल खोल कर सौगाते दे रहे हैं, लेकिन जन स्वास्थ्य रक्षक और आशा कार्यकर्ताओं के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं।
आशा संगठन की ब्लाक अध्यक्ष नीलम जादौन का कहना है कि सरकार को तुरंत फैसला कर मांगों को पूरी करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आशा कार्यकर्ताओं को मजबूरी में सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित
जन स्वास्थ्य रक्षकों और आशा कार्यकर्ताओं की हड़ताल से ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित होने लगी हैं। जन स्वास्थ्य रक्षकों के हड़ताल पर जाने से ग्रामीण क्षेत्र में क्षय रोगियों के दवाइयां मिलना बंद हो गईं, क्योंकि क्षय रोगियों को घर-घर जाकर दवाई खिलाना जन स्वास्थ्य रक्षकों का ही दायित्व है। इसक अलावा जन स्वास्थ्य रक्षकों की टीकाकरण और पल्स पोलियो जैसे महती अभियानों में भी विशेष भूमिका रहती है।
इसी प्रकार आशा कार्यकर्ताओं के काम पर न जाने से प्रसव संबंधी योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ बच्चों के टीकाकरण भी नहीं हो पा रहे हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र से प्रसूता महिलाएं प्रसव के लिए समय पर सरकारी अस्पताल में नहीं पहुंच पा रही है। ऐसा इसलिए कि ये सारे कार्य आशा कार्यकर्ताओं के ही जिम्मे हैं।