दृष्टिकोण. अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटन के मसले पर उठे विस्फोटक विवाद पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा मिलकर चर्चा करने से जरूर थोड़ी राहत मिलेगी। सरकार ने आखिरकार अमरनाथ संघर्ष समिति से सीधे संवाद की पहल की और सभी राजनीतिक पार्टियों ने तनाव शांत करने पर जोर दिया।
ये स्वागतयोग्य कदम हैं, लेकिन इन छोटे-छोटे कदमों से ही वह गहरी खाई नहीं पटेगी जो इस विवाद के चलते पैदा हो गई है। किसी और संदर्भ में कोई स्वीकार्य समाधान निकालना ज्यादा आसान होता। आखिरकार जो दांव पर लगा है वह महज चालीस एकड़ जमीन ही तो है।
दक्षिण भारत में कई राज्य बड़े-बड़े मंदिर ट्रस्ट चलाते हैं। पूरे देश में मंदिरों और वक्फ बोर्डस के पास काफी जमीन है। वैसे अमरनाथ यात्रा को सुगम बनाने के लिहाज से जरूरी नहीं है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के पास जमीन हो।
दुर्भाग्य से सभी राजनीतिक दलों ने ऐसा तरीका अपनाया, जिससे यह विवाद और गहराए। उमर अब्दुल्ला का संसद में दिया गया भाषण इसकी बेहतर मिसाल है। जब उन्होंने यह कहा कि अमरनाथ के लिए जमीन हस्तांतरण के विरोध का मसला किसी जमीन के लिए लड़ने तक ही सीमित नहीं था तो उन्होंने संप्रदायवाद और क्षेत्रीयता को साथ जोड़ दिया।
इस संबंध में खास बात यह है कि एक खास समुदाय का ही कश्मीर की जमीन पर हक बनता है। यहां तक कि कश्मीर को विशेष दर्जा देने के बावजूद इस बुनियादी सिद्धांत की स्वीकृति संप्रदायवाद को भारी रियायत है। दूसरी ओर जम्मू के प्रदर्शनकारी भाजपा के उकसावे पर लगातार एक ही बात की रट लगाए हैं। यात्रा को सुगम बनाने पर कोई संदेह नहीं था।
घाटी की ओर जाने वाली सड़कों और रेलमार्ग को बाधित कर उन्होंने राज्य को तीन भागों में विभाजित करने का अपना एजेंडा आगे बढ़ा दिया है। पीडीपी ने दोहरा खेल खेला और लगातार बयानबाजी की। कांग्रेस ने भी सांप्रदायिक आग को बरकरार रखने की चाहत में दोनों ओर से खेल खेला ताकि वह अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को और चमका सके। इस सबसे ऊपर है केंद्र द्वारा इस मसले को व्यापक तौर पर नजरअंदाज करना। इन विस्फोटक परिस्थितियों में जहां घाटी और जम्मू दोनों जगह विरोधी प्रदर्शनकारी सक्रिय हैं, मौजूदा प्रस्तावित उपायों से हद से हद तक अस्थायी शांति हो सकती है।
अमरनाथ यात्रा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक चलने वाली पावन यात्रा की बजाय लंबी काली रात जैसी लगने लगी, जिसमें हिंसा और भड़क सकती है। लेकिन इस प्रकरण ने तीन महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं जो भारतीय राजनीति को अखाड़ा बना सकते हैं। पहला साधारण संदेश यही है कि हिंसा से काम बन जाता है। भारत में ध्यान आकर्षित करने का एकमात्र जरिया हिंसक प्रदर्शन करना है।
श्रीनगर में प्रदर्शनकारियों ने पहले हिंसक प्रदर्शन सरकार को भूमि आवंटन का आदेश रद्द करने के लिए मजबूर करने के लिए किया। अब जम्मू में प्रदर्शनकारियों ने सरकार को समझौते के लिए बाध्य करने के लिए किया है। अब हर समूह अड़ियल तरीके से राजनीतिक हिंसा का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित होगा।
दूसरी बात, आज ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी साख सांप्रदायिक दायरे से परे हो और यहां एक-दूसरे की सोच के हिसाब से इस दशा की कल्पना करने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती। आखिर कौन सा राजनेता घाटी में हमारी राजनीति द्वारा पैदा किए गए संचयित अलगाववाद को समझता है?
इसके उलट घाटी का कौन सा राजनेता कश्मीरी पंडितों की आंख से आंख मिला सकता है या यह तर्क दे सकता है कि चालीस एकड़ जमीन इस दरार को भर सकती है? अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर में शांति स्थापना करने वाले नेता की छवि अर्जित की थी। लेकिन अब ऐसा एक भी नेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो।
तीसरा सबक यह है कि हम कश्मीर के राजनीतिक सुधार को लेकर ज्यादा ही आत्म-संतुष्ट हो गए। यह सच है कि जब श्रीनगर में इतनी आसानी से हिंसक विद्रोह भड़क सकता है तो हमें समझ लेना चाहिए कि घाटी के लोग खुद को किस कदर अलग-थलग महसूस करते हैं।
हमें इस बात को मानना होगा कि एक पूरी युवा पीढ़ी तैयार हो गई है, जिसने 1989 से अब तक बगावत, आतंकवाद की छाया और भारतीय सैनिकों की भारी मौजूदगी के अलावा कुछ नहीं देखा। वे सहज रूप से भारत सरकार पर भरोसा नहीं करेंगे। दूसरी ओर भारत में कई लोगों को इस बात पर भरोसा नहीं होगा कि कश्मीरी राजनेताओं का अलगाववाद के अलावा और भी कोई एजेंडा हो सकता है। इस दरार में पाकिस्तान की आईएसआई बड़े आराम से दखल देते हुए अपना दुष्चक्र चलाती है।
दीर्घकालीन हल के लिए सुधारवादी उपाय करने होंगे। प्रतीकात्मक रूप से सभी राजनीतिक पार्टियों को न सिर्फ दिल्ली में मिलना चाहिए या आंदोलनरत समूहों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करनी चाहिए, उन्हें साथ मिलकर सतत और समन्वित प्रयासों के जरिए सभी संप्रदायों की अलग-थलग पड़ी आबादी तक पहुंचना होगा।
इसके अलावा कश्मीरी नेताओं को नई तरह की राजनीति तैयार करनी होगी जो कश्मीरियों को इसके लिए राजी कर सके कि एक रास्ता है जिस पर चलकर उनके शुभचिंतक भारतीय संविधान से मिले संरक्षण के तहत उनकी भलाई के लिए कहीं बेहतर ढंग से काम कर सकते हैं, बजाय अलगाव और प्रतिरोध के सपने दिखाने वालों के।
कागजों पर समाधान पेश करना आसान है, जैसा हमने कई बार किया है। लेकिन जैसा हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक बार कहा था- ‘जब दिल भरा हो और दिमाग खाली हो तो सिद्धांतों की बात करना कोई मायने नहीं रखता।’ चालीस एकड़ जमीन तलाशना तो छोटी चुनौती है। दिल हल्का करना और सद्बुद्धि देना कुल मिलाकर बड़ी चुनौती होगी।
-लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली के अध्यक्ष हैं।