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मेहनत को मिला दिया मिट्टी में

यमुनानगर.हमने वर्षो की मेहनत से वेटलिफ्टिंग में जो मुकाम बनाया था, मोनिका ने उसे मिट्टी में मिला दिया है। मैंने जो इतिहास रचा था, आज उसे भूला दिया गया है। बस, डोपिंग के कलंक की बात हो रही है।

सच कहूं, मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। सिडनी ओलंपिक-२क्क्क् में ब्रॉन्ज मैडल जीतने वाली वेटलिफ्टर पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी बीजिंग ओलंपिक की इकलौती क्वालिफायर मोनिका के डोपिंग के आरोपों में घिरने से बेहद आहत हैं।

भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे देश के खेल नीति निर्धारकों से यही सवाल पूछती हैं कि जब नियम बनाए जाते हैं तो उन्हें निभाया क्यों नहीं जाता? क्यों नियम बनाने वाले ही इसे तोड़ते हैं?

कर्णम सीधे तौर पर वेटलिफ्टिंग की इस बदनामी के लिए इंडियन वेटलिफ्टिंग फेडरेशन को दोषी ठहराती हैं। नियमों के मुताबिक पहली बार डोप टेस्ट पॉजीविट पाए जाने पर खिलाड़ी पर दो साल का प्रतिबंध लगता है और दूसरी बारी में आजीवन प्रतिबंध। अनेक उदाहरण हैं कि फेडरेशन ने दोषी खिलाड़ियों को यूं ही छोड़ दिया।

‘बी’ सेंपल का टेस्ट करवाना चाहिए था:

क्या मोनिका को फंसाया जा रहा है? इस पर कर्णम कहती हैं कि फंसाया जाना मुश्किल लगता है। भारतीय खेल प्राधिकरण की लैब ठीक है और एक बार जो सैंपल सील किए जाते हैं तो बीच में वे खुल नहीं सकते। मोनिका को अगर खुद पर भरोसा था उन्हें बी सैंपल का टेस्ट करवाने की मांग करनी चाहिए थी।

बी सैंपल की रिपोर्ट दो दिन में आ जाती और निदरेष पाए जाने पर मोनिका बीजिंग जा सकती थी।

इन्हें क्यों छोड़ा गया:

कर्णम गिनाती हैं कि १९९६ में एशियन चैंपियनशिप में जाने से पहले प्रतिमा कुमारी का डोप पॉजिटिव पाया गया था। उस पर दो साल का प्रतिबंध लेकिन १५ दिन बाद ही वो तैयारी कैंप में पहुंच गई। शैलजा कम से कम तीन बार ऑफिशियल रूप से डोप में पॉजिटिव पाई गई, लेकिन उस पर आजीवन प्रतिबंध नहीं लगा।

एथेंस ओलंपिक में डोप पॉजिटिव पाई गई सन माचा चानू १९९३ में पटियाला में हुई जूनियर नेशनल वेट लिफ्टिंग में भी डोप पॉजिटिव पाई गई थी। कायदे से उसे किसी अवार्ड के लिए नामांकित नहीं किया जाना चाहिए था लेकिन फेडरेशन ने उसका नाम अजरुन अवार्ड के लिए रिकमेंड किया और उसे अवार्ड मिला भी।





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