दृष्टिकोण. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को हटाना आसान नहीं है। उन पर महाभियोग लगाया जाए, यह निर्णय करने में ही छह माह लग गए। आसिफ अली जरदारी सारे मामले को टालते गए। उनकी दुविधा यह थी कि वे नवाज शरीफ की सुनें या अमेरिका की।
बेनजीर भुट्टो और अमेरिका की सांठ-गांठ यह थी कि मुशर्रफ और बेनजीर एक-दूसरे के लिए बाधा न बनें। इसीलिए मुशर्रफ ने बेनजीर को स्वदेश लौटने दिया, गिरफ्तार नहीं किया और विशेष अध्यादेश निकालकर उनके और उनके पति के विरुद्ध सारे मुकदमों को उठा लिया। बदले में बेनजीर ने मुशर्रफ को राष्ट्रपति का चुनाव जीतने दिया। अपना उम्मीदवार हटा लिया।
बेनजीर के बाद जरदारी ने उस गुप्त समझौते पर ही अमल किया। न तो उन्होंने मुशर्रफ को हटाया और न ही जजों को बहाल किया। नवाज शरीफ के साथ मिलकर उन्होंने जजों की बहाली की जो तारीख घोषित की थी, वह भी खाली निकल गई। नवाज की मुस्लिम लीग ने सरकार से अपने मंत्री भी हटा लिए। इसके बावजूद जरदारी दो-टूक फैसले को टालते रहे।
इसके पीछे कई कारण थे- पहला कारण तो बेनजीर-अमेरिका समझौता ही था। दूसरा, जरदारी को यह डर था कि इफ्तेखार चौधरी जैसे पुराने जज कहीं उस अध्यादेश को रद्द न कर दें, जिसकी वजह से वे जेल जाने से बचे हुए हैं। जो जज फौजी तानाशाह को नहीं बख्श रहे थे, वे उनकी कठपुतली कैसे बनेंगे? तीसरा, अमेरिका अब भी मुशर्रफ के खिलाफ नहीं हुआ है। उन्होंने सेनाध्यक्ष पद छोड़ दिया, इसके बावजूद अमेरिका उनके साथ है। चौथा, पाकिस्तान की फौज और आईएसआई अब भी मुशर्रफ के इशारों पर चलती है।
असली सत्ता इन्हीं दो संगठनों के पास है। पांचवां, मुशर्रफ अगर हट भी गए तो पाकिस्तान की राजनीति का केंद्र खिसककर नवाज शरीफ के पास चला जाएगा। सबसे बड़ी पार्टी के नेता होने के बावजूद जरदारी की हैसियत घट जाएगी, क्योंकि माना जाएगा कि पाकिस्तान में जो भी फेर-बदल हुआ है, वह मियां नवाज की जिद के कारण ही हुआ है। छठा, जरदारी को यह शक भी था कि अगर महाभियोग चलाया गया तो संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दो-तिहाई बहुमत मिलना आसान नहीं होगा।
जरदारी के ये सारे शक आज भी सही हैं। तो फिर उन्होंने महाभियोग की घोषणा क्यों कर दी? क्या मजबूरी थी, उनके सामने? सबसे पहली बात तो यह कि पाकिस्तान की जनता के बीच मियां नवाज शरीफ का कद रोज ऊंचा होता चला जा रहा था। जजों के आंदोलन का नेतृत्व करने वे खुद पहुंच गए। उन्होंने सीमांत के कबीलों पर अमेरिकी बम-वर्षा का स्पष्ट विरोध किया। लोकप्रियता अर्जित की। उनके छोटे भाई शाहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री बन गए। सत्ता और पत्ता, दोनों की प्रचुर सुविधा हो गई।
सिंध में पीपीपी की सरकार है, लेकिन कहां पंजाब और कहां सिंध। इसके अलावा जरदारी की अपनी छवि अभी तक मटमैली है। स्वयं बेनजीर ने पति की बजाय अपने बेटे को पार्टी अध्यक्ष नामजद किया था। जरदारी पर मुकदमे नहीं चल रहे हैं, लेकिन जनता की अदालत से वे अभी तक बरी नहीं हुए हैं। उन्होंने पार्टी के स्वाभाविक नेता मख्दूम अमीन की जगह यूसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री बना दिया। इससे पार्टी में असंतोष भी बढ़ा है।
जरदारी को सबसे बड़ा खतरा यह था कि अभी तो मियां नवाज शरीफ खुलेआम जन-आंदोलन पर उतर आएंगे। वे पाकिस्तान के महानायक बन जाएंगे और जरदारी और उनकी पीपुल्स पार्टी हाशिए पर चली जाएगी। इसके अलावा जरदारी एक नई परेशानी भी महसूस कर रहे थे, वह यह कि मुसीबत में होने के बावजूद मुशर्रफ अपनी चला रहे थे। उन्होंने आईएसआई को गृह मंत्रालय में डालने का फैसला उलटवा दिया। जरदारी के कहने से न तो वे स्टेट बैंक का गवर्नर नियुक्त कर रहे थे और न ही यूएई में नया राजदूत भेज रहे थे।
हाल ही में जब सिंध की प्रांतीय सरकार ने जजों की बहाली का अनुरोध किया तो मुशर्रफ ने सभी न्यायाधीशों की बहाली पर दस्तखत कर दिए, लेकिन मुख्य न्यायाधीश को बहाल नहीं किया, क्योंकि वे मुशर्रफ की आलोचना किया करते थे। कुल मिलाकर आसिफ जरदारी के पास इसका कोई विकल्प नहीं रह गया था कि वे महाभियोग का समर्थन करें।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या महाभियोग सफल होगा? वह हो भी सकता है और नहीं भी। इस समय पाकिस्तान की संसद के दोनों सदनों में कुल मिलाकर 442 सदस्य हैं। उनका दो-तिहाई हुआ 295। जब तक महाभियोग के पक्ष में 295 मत न पड़ें, वह सफल नहीं हो सकता। सत्तारूढ़ गठबंधन के चारों प्रमुख दलों- पीपुल्स पार्टी, मुस्लिम लीग(एन), अवामी पार्टी और जमीयत- तथा कुछ छोटे-मोटे दलों को मिलाकर कुल संख्या बनती है- 279। यानी अब भी 16 वोट कम हैं। ये कहां से आएंगे?
नेशनल एसेंबली के 18 और सीनेट के 12 सदस्य ऐसे हैं, जो निर्दलीय है लेकिन सरकार का साथ दे रहे हैं। अगर मतदान के दिन भी ये साथ रह गए तो जनरल मुशर्रफ गए। यह भी उम्मीद की जा रही है कि मुशर्रफ समर्थक मुस्लिम लीग(क्यू) में फूट पड़ जाए।
ऐसी हालत में मुशर्रफ का हटना निश्चित है, लेकिन इसका उल्टा भी हो सकता है। संसद के 30 निर्दलीय सदस्यों को तरह-तरह के प्रलोभन दिए जा सकते हैं और पीपुल्स पार्टी के असंतुष्ट सदस्यों को भी क्रॉस-वोटिंग या गैर-हाजिरी के लिए तैयार किया जा सकता है। बिलकुल वही नाटक इस्लामाबाद में भी खेला जा सकता है, जो दो हफ्ते पहले दिल्ली में खेला गया था।
इसके अलावा मुशर्रफ धारा 58-2बी का इस्तेमाल करके संसद को भंग भी कर सकते हैं। जरदारी क्या कर लेंगे? जुल्फिकार अली भुट्टो जिया उल हक के खिलाफ क्या कर सके? 1999 में मुशर्रफ के खिलाफ नवाज शरीफ पत्ता भी नहीं हिला सके, जबकि वे तीन-चौथाई बहुमत से प्रधानमंत्री बने थे। इसमें शक नहीं कि मुशर्रफ काफी अलोकप्रिय हो गए हैं, लेकिन पिछले छह माह में इन तथाकथित लोकतांत्रिक नेताओं की कलई भी खुल गई है।
पाकिस्तान में भारत की तरह प्रचंड जनाक्रोश और जन-आंदोलन की परंपरा कभी नहीं रही। न आजादी से पहले और न ही बाद में। इसीलिए फौज अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र है। पाकिस्तान में बैलेट पर बुलेट का राज्य हमेशा चलता आया है। ऐसे में अगर मुशर्रफ टिके रह जाएं और संसद बैरक में धकेल दी जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
-लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं।