संपादकीय. जैसे ही मुद्रास्फीति का नया आंकड़ा 12 फीसदी के पार गया, एक बार फिर सवाल उठने लगा कि क्या रिजर्व बैंक को रेपो दरों व साख जमा अनुपात (सीआरआर) में इजाफा करना पड़ेगा।
एक सवाल यह भी है कि क्या मुद्रास्फीति का ग्राफ अब नीचे आना शुरू हो सकता है? यह बात सही है कि अप्रैल से जून अंत तक मुद्रास्फीति बढ़ने की जो रफ्तार थी, वह जुलाई में धीमी पड़ी है।
रिजर्व बैंक द्वारा किए गए मौद्रिक उपायों का असर अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। भविष्य में मांग पैदा होने के अनुमानों पर कुछ दबाव तो दिखाई देने लगा है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह आहलूवालिया संभवत: इन्हीं अनुमानों के आधार पर मुद्रास्फीति एक अंक में आने की बात कर रहे हैं।
बेशक मुद्रास्फीति कुछ सप्ताह में घटती नहीं है, तब भी कुछ माह में उसका ग्राफ नीचे आना तय है। मौद्रिक उपायों का असर धीमा होता है। ब्याज दरों में इजाफे के बाद कर्ज की मांग घटने का असर कुछ माह बाद आर्थिक विकास पर साफ दिखाई देने लगेगा।
सरकार की तमाम एजेंसियां विकास दर घटकर 7.5-8 फीसदी रहने का अनुमान लगा रही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि यह मुद्रास्फीति को काबू में करने की कीमत है, जो अर्थव्यवस्था को चुकानी होगी। सितंबर और अक्टूबर तक कीमतें गिरने की उम्मीद शायद इसलिए की जा रही है कि मानसून अच्छा रहा है तो खरीफ की कृषि उपजें खाद्य पदार्थो की कीमतों को नीचे ला सकती हैं।
जहां तक अर्थशास्त्रियों का सवाल है, उनकी नजर कच्चे तेल की कीमतों पर टिकी है। कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर से नीचे आ गई हैं, जिन्हें स्थिर नहीं कहा जा सकता। वास्तव में, इस साल अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त तरलता का स्रोत सरकार के खर्च रहे हैं। यह चुनाव के पहले का साल है, इसलिए सरकार अगले कुछ माह में विकास योजनाओं पर खर्च बढ़ाएगी।
अक्टूबर-नवंबर में तरलता में फिर इजाफा होता है तो रिजर्व बैंक को फिर सीआरआर में इजाफा करना होगा। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति से इस्तीफा देने वाले डॉ. सी. रंगराजन की यह राय काफी हद तक सही कही जा सकती है कि रिजर्व बैंक की सख्त नीति के कारण मुद्रास्फीति अगले महीनों में 9 फीसदी के आसपास आ सकती है और वह इस स्तर पर लंबे समय तक बनी भी रह सकती है।