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पैटर्न में बदलाव की कवायद श़ुरू

कोटा. आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) के पैटर्न में फिर से बदलाव करने की उच्च स्तरीय कवायद शुरू हो गई है। आईआईटी बोर्ड ने परफॉरमेंस कार्ड जारी करते हुए इस साल ओवरऑल कटऑफ स्कोर में गिरावट पर गहरी चिंता जताई है।

कार्ड के अनुसार जेईई, 2007 में कटऑफ 206 रहा था, जो इस साल घटकर 489 अंकों में से 180 अंक रह गया है। एससी और एसटी वर्ग में कटऑफ गिरकर 126 से 104 रह गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही साल में कटऑफ प्रतिशत 42.12 से घटकर 36.80 रह जाने से देश के विश्वस्तरीय प्रौद्योगिकी संस्थानों का स्तर गिर सकता है।

क्वालिफाइड छात्र भी फिजिक्स में जीरो
सब्जेक्ट कटऑफ में टॉप क्वालिफाइड 80 फीसदी छात्रों में से कई को फिजिक्स में शून्य अंक, केमिस्ट्री में 3 और मैथ्स में 5 अंक मिले हैं। वहीं एससी एसटी वर्ग के छात्रों को क्रमश: 0, 2.7 और 4.5 मिले हैं। पिछले साल फिजिक्स में कटऑफ 1, केमिस्ट्री में 3 और मैथ्स में 4 अंक रहा था। आईआईटी मुंबई के चेयरमैन एन वेंकटरमानी के अनुसार नेगेटिव मार्किग के कारण जेईई,08 में नीचे से 20 फीसदी छात्रों को कटऑफ (-) 38 अंक रहा है।

85 फीसदी अंकों की अनिवार्यता पर विचार
आईआईटी विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र कोचिंग संस्थानों में सिर्फ जेईई के तीन विषयों के ऑब्जेक्टिव पेपर की ही तैयारी करते हैं जिससे उनका मानसिक स्तर आईआईटी के स्तर से कम रह जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि छात्रों को स्कूलों में नियमित पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

संयुक्त प्रवेश परीक्षा की न्यूनतम योग्यता क्लास-12 में न्यूनतम 60 फीसदी अंकों की बजाय 85 फीसदी अंक कर दी जाए, जिससे छात्र स्कूलों में पढ़ने को बाध्य होंगे। डीन वीजी इडिचंदी ने सुझाव दिया कि कक्षा-8 और 9 से ही कोचिंग संस्थानों में प्रवेश लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए जेईई पेटर्न को समाप्त करके मेरिट आधार पर प्रवेश दिए जाने चाहिए। एक अन्य विशेषज्ञ ने उच्च प्रबंध संस्थानों की तरह ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू पेटर्न अपनाने की सलाह दी है।

एक्सपर्ट्स व्यू : मेहनती बच्चों के लिए कोई फर्क नहीं

हवा में नहीं करें बात
पहले जेईई में कटऑफ स्कोर ज्यादा रहता था, लेकिन आईआईटी बोर्ड ने मेरिट की नई परिभाषा बनाकर इसे और उलझा दिया है। मेरिट में बॉटम के 20 फीसदी बच्चों पर विचार ही नहीं किया जाता है। टॉप 80 फीसदी छात्रों में से कॉमन लिस्ट बनाकर 7 हजार छात्रों की रैंक घोषित की जाती है। इससे गिरावट आई है।

पैटर्न में बार-बार बदलाव करने से सुधार नहीं आएगा, जो छात्र इस साल चयनित हुए हैं, उनके क्लास-12 के अंकों का प्रतिशत देख लें तो सच्चई का पता लग जाएगा, केवल हवा में बात करने से कुछ नहीं होगा। पिछले 13 सालों में आईआईटी ने कई बार पैटर्न बदला है, लेकिन मेहनत करने वाले बच्चे हर बार चयनित हुए हैं।
- आरके वर्मा, प्रबंध निदेशक, रेजोनेंस

टेलेन्ट का होगा चयन
आईआईटी बोर्ड चाहे कोई भी सिस्टम लागू कर दे, होनहार छात्रों के चयन को कोई रोक नहीं सकता। पेपर मुश्किल बनाने से इस साल कटऑफ कम हुआ है। इसका दोष कोचिंग संस्थानों को क्यों दिया जा रहा है। केवल स्कूल की तैयारी करके छात्र आईआईटी में चयन होने का सपना नहीं देख सकता।

बार-बार परीक्षा पेटर्न बदलने से आईआईटी का स्तर कैसे बढ़ सकता है। पेटर्न सब्जेक्टिव रहे या ऑब्जेक्टिव, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, जिसमें टेलेंट है और सालभर मेहनत की है, उसका चयन होना निश्चित है।
- पीके बंसल, सीईओ, बंसल क्लासेज

सब्जेक्टिव पैटर्न सबसे बेहतर
जेईई के पुराने सब्जेक्टिव पैटर्न का कोई मुकाबला नहीं है। ऑब्जेक्टिव पेपर से छात्रों की एनॉलिटिकल एबिलिटी की सही परख नहीं हो सकती। 25 साल के स्थापित सिस्टम के साथ क्यों नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। देश के आईआईटीयन दुनिया में साबित कर चुके हैं कि वे प्रतिभा में किसी से कम नहीं हैं। आठ साल से कोचिंग को निशाना बनाकर पैटर्न के साथ छेड़छाड़ हो रही है, जबकि कोचिंग संस्थान टेलेंट में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाकर उन्हें तराशने का काम ही कर रहे हैं।
- प्रमोद माहेश्वरी, प्रबंध निदेशक, कैरियर पाइंट





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