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शादी करने आए थे,साधु बन गए

इंदौर. वे बैंडबाजे और शाही वेशभूषा में घोड़ी पर चढ़कर दूल्हा बनकर आए थे.. बरात में भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते चल रहे..बलभद्र.. राजपुरोहित.. सहित कई राजा महाराजा..रानियां.. और प्रजाजन नाचते-गाते चल रहे थे। ऐन वक्त पर दूल्हे में बदलाव आ गया और वह शादी करने के बजाय संन्यासी बनकर चल दिया।

यह नजारा था खेल प्रशाल का जहां रविवार को जैन र्तीथकर भगवान नेमिनाथ पर आधारित महानाट्य की प्रस्तुति दी गई। इसमें भगवान के जन्म से वैराग्य तक के प्रसंगों का प्रभावी मंचन किया गया। बरात के महाराजा उग्रसेन के महल पर पहुंचते ही राजकुमार अरिष्टनेमी (जो भगवान श्रीकृष्ण के भाई हैं) को पशुओं की चीत्कार की आवाजें सुनाई देती हैं। इस पर वे इतने व्यथित हो गए कि यदि मेरी गृहस्थी बसाने के लिए पशुओं की जान ली जा रही हो तो फिर ऐसे जीवन को धिक्कार है।

वे वैराग्य धारण कर गिरनार शिखर पर साधना के लिए चले जाते हैं। उन्हें भाई श्रीकृष्ण, भाभी रुक्मिणी, पिता महाराजा समुद्र विजय और माता रानी शिवादेवी, महाराजा उग्रसेन आदि सभी मनाते हैं पर वे फैसला नहीं बदलते हैं। सबसे बाद में उग्रसेन की बेटी राजुल (जिससे विवाह तय हुआ था) को जब पता चलता है तो वह गश खाकर गिर जाती है। अत्यंत भावपूर्ण गीत के साथ वह मनाती है लेकिन नेमी नहीं मानते हैं। फिर राजुल कहती है जब आप संन्यास ले रहे हैं तो मेरा सोलह श्रंगार बेकार है और वह भी उनके पीछे चल पड़ती है।

नीलवर्णा श्वेतांवर मूर्तिपूजक ट्रस्ट द्वारा आयोजित महानाट्य में इंद्र की भूमिका में धर्मेद्र मेहता, नेमीनाथ आशीष लूनिया, श्रीकृष्ण डॉ. शांतिलाल पारस, रुक्मिणी सुमन पारस, इंद्राणी वंदना मेहता बने। महानाट्य का मार्गदर्शन साध्वी जिनशिशु प्रज्ञासागर ने दिया। वे पिछले वर्ष भोपाल में भी अपने चातुर्मास के दौरान इस महानाट्य की प्रस्तुति करवा चुकी हैं।





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