भोपाल. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पेट्रोल-डीजल की मूल्यवृद्धि के खिलाफ सप्ताह में एक दिन साइकिल से मंत्रालय जाने का जो निर्णय लिया है, उस पर कतिपय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की निगाहें लग गई हैं।
इनके बीच किसी ने यह प्रचारित कर दिया है कि जिस साइकिल से सीएम मंत्रालय आते हैं, उन्हें जो सामने दिखता है उसे थमाकर वे मंत्रालय में चले जाते हैं। बाद में यह साइकिल उसकी ही हो जाती है।
बस, यह बात धीरे-धीरे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के बीच फैल गई और अब इस साइकिल को पाने की फिराक में कई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। गौरतलब है कि जब से सीएम ने साइकिल यात्रा शुरू की है, तब से अब तक उनके काफिले के लिए मंगाई गई साइकिलों में से दो-तीन साइकिलें गुम हो चुकी हैं।
‘खरे’ साबित हुए खरे
अफसर भांति-भांति के होते हैं। अधिकतर सरकारी सुख-सुविधाओं की खातिर कुछ भी करने को तैयार और विदाई के बाद भी बंगलोंपर कुंडली जमाए बैठे रहने वाले। कुछ महानुभाव तो बंगले के चक्कर में पद पुनर्वास के लिए जोड़-तोड़ बैठाने में मसरूफ, लेकिन पिछले दिनों सेवानिवृत्त हुए वन विभाग के प्रमुख वीआर खरे उन बिरले अफसरों में हैं, जिन्हें ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ कहा जाता है।
वे अपनी सेवा के आखिरी दिन 31 जुलाई को ही बंगला वापस कर निजी निवास पहुंच गए। हाल ही में एक पारिवारिक त्रासदी से गुजरे श्री खरे ने सकारात्मक सोच, वन व वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम से समकालीन व्यवस्था में खुद को वाकई खरा साबित किया था। उनकी विदाई से अफसरों की इस दुर्लभ जमात से एक संख्या कम हो गई है।
जैसा बंगला वैसा इंसाफ हो
पिछले हफ्ते दमोह के लड़ाकू सामाजिक कार्यकर्ता संतोष भारती किसी मामले में एक सूचना आयुक्त के सामने इंसाफ की खातिर जिरह कर रहे थे। अपनी बात कहते हुए अचानक उन्होंने पंैतरा बदला और कहा, जैसा भव्य बंगला आपका है, जिस दिलदारी से आपने उसे बनाया-सजाया है, उसी दिलदारी से इंसाफ भी कीजिए हमारे साथ।
उन्होंने आगे जोड़ा कि पूरे प्रदेश में किसी अफसर का ऐसा विशाल बंगला मैंने नहीं देखा। श्री भारती ने जब उनकी शान में इस तरह बेमौसम कसीदे पढ़े तो आयुक्त महोदय दाएं-बाएं होते नजर आए। वे कहते भी तो क्या? बंगला तो है ही न्यारा। वैसे, अपने जमाने में काफी ‘अच्छे-अच्छे’ पदों पर साहब रह चुके हैं।
असली जिहाद
पर्यावरण बिगाडऩे के लिए पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एमएन बुच किसी को नहीं बख्शते। भोपाल में पर्यावरण प्रेमी लेखक शब्बीर कादरी की किताब ‘संकट में धरती’ के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने नेताओं पर खूब कटाक्ष किए। बोले, मैं वोट भले ही देता हूं, लेकिन कोई नेता मेरा नुमाइंदा नहीं है।
केरवा डेम के पास की हरितिमा का उल्लेख उन्होंने यह कहकर किया कि ‘गरीबों के मसीहा की कुटिया’ के पास। धरती के प्रति शब्बीर की मोहब्बत को उन्होंने असली जिहाद बताते हुए अपील की कि इसमें सबको शामिल होना चाहिए। बुच बाबा ने फरमाया कि हरियाली में भोपाल संसार में अव्वल है। यहां तीस हजार एकड़ जमीन हरे-भरे वृक्षों के नीचे है। इसे किसी भी कीमत पर बचाएं। नेताओं के भरोसे न रहें। वे सिर्फ जमीनें बेचना, पेड़ काटना और कटवाना जानते हैं।
शुरू हुई सिंह गर्जना
कांग्रेस हाईकमान ने विधानसभा चुनाव के दावेदारों से आवेदन मांगकर पार्टी के सोए हुए शेरों को भी जगा दिया है। अजरुनसिंह की कैबिनेट में नंबर दो का दर्जा पाने वाले पूर्व गृहमंत्री भारत सिंह को भी मानो इस बहाने ‘गढ़ी’ से बाहर निकलकर गरजने का मौका मिल गया। उन्होंने आवेदन देकर एलान कर दिया कि वे भी जावरा से फिर से किस्मत अजमाने के इच्छुक हैं। अब दहाड़ने की बारी इलाके के दूसरे सिंह पूर्व कृषि मंत्री महेंद्रसिंह कालूखेड़ा की है।
श्री कालूखेड़ा पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि भले ही कोई ‘शेखचिल्ली की तरह सपने देखे’,वे जावरा से ही चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने एक तरह से भारत सिंह को ही चुनौती दी थी। वैसे टिकट तो अभी दूर की बात है, भारत सिंह समर्थक इसी बात से खुश हैं कि विरोधी खेमे में हलचल तो मची।
मुहावरे और नारे
स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा चुनावी वर्ष में स्थानीय स्तर पर प्रचलित मुहावरे और लोकोक्तियों को संकलित करने की पहल को चुनाव प्रचार से जोड़कर देखा जा रहा है। मतदाताओं को रिझाने उनकी ही भाषा में उनके ही मुहावरे से मिलते-जुलते नारे तैयार करने की कवायद भाजपा में चालू हो गई है। हालांकि शिक्षा विभाग के आला अफसर अपने इस अनूठे प्रयास को ऐसा नहीं मानते हैं, लेकिन दबी जुबान में वे इतना जरूर कहते हैं कि हर अच्छी बात का लोग राजनीतिक अर्थ क्यों निकालते हैं? मुहावरों का इस्तेमाल तो चुनावी नारों के लिए होता ही आया है।
पुराने सूरमा की वापसी
चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में प्रदेश भाजपा पुराने सूरमाओं को याद कर रही है। इनमें लंबे समय तक संगठन में शक्तिशाली नेताओं में शुमार रहे कैलाशनारायण सारंग की वापसी खासी अहम है। श्री सारंग के तजुर्बे को देखते हुए चुनावी कार्यक्रम का क्रियान्वयन का जिम्मा उन्हें सौंपा गया है। इसके पीछे उनका मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के साथ विश्वसनीय रिश्ता बड़ी वजह है। कहते हैं पार्टी के पितृ पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे की छाया में आगे बढ़े सारंग को एक जमाने में मंडल स्तर तक नेताओं के नाम जुबानी याद रहते थे। ऐसे में उम्रदराज कई नेताओं को भी अपने दिन फिरने की आस बंधी है।
..और भैंस गई पानी में प्रशासनिक पदों पर पोस्टिंग के लिए शिवराज सरकार में जितनी कवायद होती है, शायद ही इसके पहले की किसी और सरकार में होती होगी। ताजा मामला उज्जैन कमिश्नर का है। इसके लिए कई अफसर ‘पूर्ण प्रयास’ कर चुके थे। अंतत: दो नाम तय हुए, लेकिन चुनाव आयोग की मंजूरी के पेंच में यह प्रयास निर्थक हो गए। तीसरे नाम को हरी झंडी मिली, जो ‘प्रयासहीन’ पोस्टिंग की श्रेणी में आ गई। जाहिर है पोस्टिंग के पुण्य लाभ के मध्यस्थ तंत्र को झटका लगा होगा, यानी भैंस गई पानी में। अब लोगों की नजर मंडी आयुक्त पद पर है, जो एसएस उप्पल के रिटायरमेंट के बाद एक हफ्ते में ही दूसरे अफसर के पास बतौर प्रभार में है।
भारी पड़ा अखबार खरीदना
चुनावी चक्कर में नेताओं को आम आदमी के भजन गाना पड़ते हैं, लेकिन कभी-कभी यह आम आदमी भी भारी गरिष्ठ हो जाता है। एनजीओ सम्मेलन में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीना के साथ भी ऐसा ही वाकया हिंदी भवन में घटा।
लंच ब्रेक में भोजन के लिए जाते मीनाजी को दोपहर के अखबार बेचने वाले एक लड़के ने पकड़ा। उस दिन के अखबार में छपी मीनाजी की तस्वीर दिखाते हुए लड़के ने कहा, ‘यार भाई साहब, आज तो आप खूब छा रहे हो। इतनी अच्छी तस्वीर छपी है तो अखबार तो आपको लेना ही पड़ेगा।’
एकाध अखबार होता तो वे खरीद भी लेते, लेकिन लड़का उन्हें पूरा बंडल टिकाने पर तुला था। अब बेचारे मीनाजी क्या करते? उन्होंने कम्बख्त आम आदमी को कोसते हुए एक कॉपी खरीद ली, लेकिन इतने झक कपड़े पहनने वाले सेठ की कंजूसी पर लड़के ने जरूर चार गालियां मारी।