संपादकीय. बीजिंग ओलिंपिक में 10 मीटर एअर राइफल इवेंट में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के अभिनव बिंद्रा ने न केवल विश्व खेल जगत में भारत की शान बढ़ाई है बल्कि भारतीय खेलों में इतिहास भी रच दिया है।
इस गोल्डन सफलता के लिए उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। वे गत आठ सालों से एक तपस्वी की तरह अभ्यास किए जा रहे थे।
अपने शानदार प्रदर्शन से थोड़े ही समय में वल्र्डकप, राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाड में स्वर्ण जीत चुके अभिनव की तमन्ना ओलिंपिक पदक की थी जो उनके असाधारण आत्मविश्वास के चलते पूरी हो गई।
यह पहला मौका है जब ओलिंपिक की किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में किसी भारतीय खिलाड़ी ने स्वर्ण जीता है। इसके पहले कई बार भारतीय खिलाड़ी फाइनल में स्थान बनाकर भी स्वर्ण से चूक गए थे, पर इस बार अभिनव ने अपने जी-तोड़ प्रयासों से वह कर दिखाया, जिसके बारे में हर भारतीय सिर्फ सोचा करता था। बिंद्रा की इस उपलब्धि पर देशभर में जश्न का माहौल है।
राजीव गांधी खेल रत्न व अजरुन अवॉर्ड से नवाजे गए अभिनव चार साल पहले एथेंस ओलिंपिक में भी पदक के दावेदार थे लेकिन थोड़े अंतर से ही चूक गए थे। वे उस हार से हताश हुए बगैर परिश्रम करते रहे और बैक इंजुरी के बाद भी स्वर्ण जीतने में सफल रहे।
अभिनव की इस सफलता में उनके परिजन द्वारा दिए गए सकारात्मक सहयोग का भी महत्वपूर्ण योगदान है। बिंद्रा की इस उपलब्धि के बाद कहा जा सकता है कि मिल्खासिंह व कपिलदेव के बाद चंडीगढ़ ने एक और अद्वितीय सितारा भारतीय खेल जगत को दिया है।
बिंद्रा की उपलब्धि से सारा देश इसलिए भी खुश है क्योंकि 28 साल बाद ओलिंपिक में स्वर्ण का सूखा खत्म हुआ है। 1980 में मॉस्को ओलिंपिक में भारत ने हॉकी में स्वर्ण जीता था। उस समय कई देशों के बहिष्कार के कारण उस जीत को बहुत महत्व नहीं मिला था। अब बिंद्रा की इस उपलब्धि से यह माना जा सकता है कि भारतीय खेलों का भविष्य उज्ज्वल है। जैसा कि भारतीय ओलिंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने कहा भी है कि लंदन ओलिंपिक से पदकों का सिलसिला बढ़ता जाएगा। स्वयं बिंद्रा ने भी जीत के बाद कहा कि इस जीत से खेलों में भारत की तस्वीर बदलेगी। उम्मीद है कि उनकी बात सही साबित होगी और भारतीय तिरंगा हर ओलिंपिक में कई बार फहराएगा।