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वर्चस्व बनाती भाषायी पत्रकारिता

दृष्टिकोण. भाषायी पत्रकारिता में मेरा शुरू से ही विश्वास रहा है। हालांकि मेरा पिछले 25 वर्षो का पत्रकारिता करियर मुख्यत: अंग्रेजी प्रकाशनों का संपादन करते गुजरा है।

सत्तर के दशक के उस दौर में अंग्रेजी के ही तमाम दैनिक व अन्य प्रकाशनों का बोलबाला था और उन चुनिंदा प्रकाशनों की उपस्थिति इतनी मजबूत थी कि सभी के लिए उनका विकास ही सर्वोच्च प्राथमिकता थी। ऐसा होना स्वाभाविक भी था, लेकिन इसका यह मतलब भी कतई नहीं था कि हम भाषायी पत्रकारिता की ताकत और क्षमता से ही अनजान रहे। सच तो यह है कि मैं हमेशा भाषायी पत्रकारिता का पक्षधर रहा।

पच्चीस साल पहले मैं पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए मुंबई आया था। मेरे पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं थी और न ही कोई खास चर्चा लायक बायोडाटा। अगर कुछ था तो सराही गई कविताओं की कुछ किताबें, एक पद्मश्री सम्मान और विदेशों के कम लोकप्रिय विश्वविद्यालयों से प्राप्त कुछ मानद डॉक्टरेट की उपाधियां।

ये उपाधियां उन विश्वविद्यालयों की थीं जो कवियों का सम्मान करते थे। सही है, मैंने अपना जीवनयापन करने के लिए डिजाइनिंग और फोटोग्राफी भी की। संडे मैगजीन के लिए कुछ कवर स्टोरीज कीं जिसका संपादन मेरे मित्र एमजे अकबर किया करते थे। द टेलीग्राफ के पहले पृष्ठ के लिए मैंने दो वर्षो तक कार्टून भी बनाए।

यह सत्तर के दशक का वह दौर था जब हम ऐसे ही जिंदगी जिया करते थे। हम अलग-अलग तरह से दुनिया को जानने का लुत्फ लिया करते थे, जिनमें से एक माध्यम लेखन भी था। विकल्प कई थे। इस मामले में मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूं कि मेरी कविताओं ने कई दिलों को झंकृत किया और इंदिरा गांधी मेरी पहली प्रशंसिका बनीं। हम लोगों के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान भी हुआ और इस तरह राजनीति से मेरा पहला परिचय हुआ। हालांकि बाद में जब मैंने आपातकाल के खिलाफ लिखना शुरू किया तो हमारे बीच दूरियां बन गईं।

मैं कभी भी मीडिया से नहीं जुड़ता अगर संयोग से मेरी मुलाकात एक फ्लाइट में अशोक जैन से नहीं हुई होती। उन्होंने सिर्फ 24 घंटे के भीतर मुझे कोलकाता छोड़ मुंबई आने के लिए कहा। मेरा काम? टाइम्स ऑफ इंडिया के समूह संपादक और पब्लिशिंग डायरेक्टर का था।

कई लिहाज से वह मेरी पहली नौकरी थी। इसके पहले मैं जीवनयापन के लिए जिस तरह के काम कर रहा था, उनका उल्लेख न करना ही ठीक होगा। इन सभी कामों का लेखन से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन इन्हें करते हुए मुझे लेखन का समय निकालने में मदद मिलती थी। यही तो मैं चाहता था। मेरे लिए लेखन आत्म अभिव्यक्ति का ही माध्यम था।

लेकिन पत्रकारिता आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। यह तो दुनिया बदलने का माध्यम है या इसके जरिए मैं कुछ ऐसा ही करना चाहता था। इस कारण मैंने कविता करनी छोड़ दी और वह सब कुछ छोड़ दिया जो मुझे कोलकाता से बांधे हुआ था। इस तरह मैंने अपने आप को चौबीस घंटे की पत्रकारिता में झोंक दिया, जैसे कि मेरा जीवन सिर्फ इसी पर निर्भर हो। यही नहीं इसके अलावा मैं इस पेशे के प्रबंधन से जुड़े कामों को भी देखता था। मैं संपादकीय और मैनेजमेंट के बीच का पहला पुल था।

अशोक जैन ने मुझे इस तथ्य से अवगत कराया कि स्वतंत्र पत्रकारिता ठीक है, लेकिन अगर मीडिया व्यवसाय को संभालना और आगे ले जाना है तो उसका भी बेहतर प्रबंधन करना होगा। यही मेरा काम था। यह कुछ ऐसा था जिसे करने में मुझे मजा आता था। यद्यपि लोग मुझे इस तौर पर जानते हैं कि मैं इलस्ट्रेटेड वीकली पत्रिका के विकास के सबसे चर्चित दौर में संपादक था। मैं अपने आपको एक ऐसे शख्स के रूप में देखता हूं जिसने मीडिया के भविष्य को देखते हुए उसके विकास के लिए जरूरी ब्लॉक्स को यथास्थान जमाने की कोशिश की।

एमवी कामथ और केसी खन्ना के संपादक रहते इलस्ट्रेटेड वीकली नाजुक दौर से भी गुजरी। फिर मैंने उसे रिलांच किया और उसकी प्रसार संख्या को चार लाख तक पहुंचाया। उस समय की वीकली भारत की प्रभावशाली पत्रिकाओं में शुमार होती थी और हमने सप्ताह दर सप्ताह अपनी स्टोरीज के जरिये इतिहास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

हमने खोजी पत्रकारिता शुरू की, साक्षात्कार आधारित कवर स्टोरी की शुरुआत की और कॉमिक्स स्ट्रिप्स वर्ग पहेली और खुशवंत सिंह शैली की पुरानी पत्रकारिता को कहीं पीछे छोड़ दिया। उस वक्त वीकली का पर्याय साहस और जनहित के मुद्दे होते थे, जिनमें विजय हासिल करने के लिए हमने हर स्तर पर संघर्ष किया। और हां, हमने भाषायी मीडिया से भी ढेरों सामग्री जुटाई, जिन तक अंग्रेजी भाषी पाठकों की कभी पहुंच ही नहीं रही।

धर्मवीर भारती के समय में मैं धर्मयुग देखा करता था। मैंने महाराष्ट्र टाइम्स और नवभारत टाइम्स का काम भी देखा। मेरे लिए तो भाषायी मीडिया भारतीय पत्रकारिता का सुनहरा भविष्य था। और, आज मुझे भाषायी मीडिया के विकास को देखकर गर्व की अनुभूति होती है। दैनिक भास्कर सरीखे समाचारपत्र जमीन से बुलंदी तक की कहानी बयान करते हैं। आज यह प्रिंट की दुनिया का सिरमौर है। यह सच नहीं रहा है कि अंग्रेजी मीडिया ही सारे विज्ञापन हथिया लेता है और भाषायी मीडिया के हाथ थोड़ा-बहुत हिस्सा ही आता है।

आज यह स्थिति बदल चुकी है। नियम सभी के लिए एक ही हैं, लेकिन धीरे-धीरे भाषायी मीडिया अपना सही हक और सम्मान हासिल कर रहा है। टेलीविजन का उदाहरण लीजिए, हिंदी चैनलों का ही राज है। इसी तरह मनोरंजन के हिंदी चैनल सफल हैं। अखबारों की तरफ निगाह डालें तो यहां भी हिंदी का राज है। पत्रिकाओं में भी हिंदी हावी है।

यही स्थिति गीत-संगीत, फिल्मों, धारावाहिकों की है, जहां हिंदी शोभित हो रही है। अंग्रेजी का वर्चस्व सिर्फ इंटरनेट पर ही रह गया है। लेकिन मेरा यकीन मानें आने वाले पांच वर्षो में यहां भी हिंदी का वर्चस्व होगा। इसके लिए भारत के आमजन की भाषा हिंदी के साथ खड़े रहने के लिए आप बधाई के पात्र हैं। यहां तक कि मैं, 25 वर्षो बाद ही सही हिंदी फिल्में बना रहा हूं। ऐसी फिल्में जो हिंदी भाषा में होते हुए भी पूरी दुनिया को अपना लोहा मनवा रही हैं।

इस क्रांति को अंजाम देने के लिए क्या आपको गर्व की अनुभूति नहीं होती? क्या यह गर्व की बात नहीं है कि हमारे पास दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता और मजबूत मीडिया है, वह भी अपनी हिंदी भाषा में?
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।





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