कोलकाता. अगस्त के पहले सप्ताह में अगर स्टील की कीमतों पर लगी रोक खत्म हुई तो स्टील निर्माता पांच फीसदी कीमतें बढ़ा सकते हैं। इस्पात मंत्रालय ने कंपनियों को सात अगस्त तक कीमतें स्थिर रखने के लिए कहा था।
सरकार शुल्क में कमी और इनपुट लागत घटाने के उपायों पर विचार कर रही है। कच्चे माल की लागत पहले ही काफी बढ़ चुकी है। लौह अयस्क और कोकिंग कोल की कीमतें सालभर में 65 फीसदी और 200 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं।
उद्योग के सूत्रों का कहना है कि स्टील उत्पादक कीमतों को एक निश्चित स्तर तक ही सीमित रख सकते हैं। उनमें से कई ने विस्तार कार्यक्रमों के लिए धन अंदरूनी स्रोतों से जुटाया है। अगर कीमतें बढ़ाने पर रोक लगी रहती है तो उद्योग पर विपरीत असर होगा। जिस गति से ब्याज दरें बढ़ रही हैं, बाहर से कर्ज लेना महंगा साबित होगा।
उद्योग को मदद पहुंचाने के लिए इस्पात मंत्रालय ने लौह अयस्क के आपूर्तिकर्ताओं को उचित दाम पर अयस्क मुहैया कराने के लिए कहा है। सूत्रों का कहना है कि कोयला भी कम कीमत पर उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाएंगे।
ज्यादातर स्टील निर्माताओं पर लागत का दबाव बरकरार है। उनकी दूसरी और तीसरी तिमाही की आमदनी पर इसका असर पड़ेगा। सरकारी कंपनी सेल को सालाना डेढ़ करोड़ टन लौह अयस्क की जरूरत पड़ती है।
यह 70 फीसदी आयात करती है और 30 फीसदी घरेलू बाजार से जुटाती है। टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू पर भी असर पड़ा है। एम्के के विश्लेषक विशाल चांडक और चिराग खासगीवाला का कहना है कि टाटा स्टील अपनी कोकिंग कोल की क्षमता का 70 फीसदी इस्तेमाल करते हैं और 30 फीसदी आयात करती हैं। कोकिंग कोल के अनुबंधों पर जून में दस्तखत हुए थे। इनका असर वित्त वर्ष 2009 की दूसरी तिमाही में पड़ेगा।
आनंद राठी रिसर्च के सम्मेलन में स्टील निर्माताओं ने 4-5 फीसदी कीमतें बढ़ाने के इरादे जाहिर किए। अभी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कीमतों में 38 फीसदी अंतर है।
आनंद राठी रिसर्च के तरुण सिसोदिया का कहना है कि जनवरी 2008 के बाद औसतन टाटा स्टील की कीमतें 22 फीसदी बढ़ी हैं। लागत बढ़ने के कारण प्रबंधन 4 फीसदी कीमतें बढ़ाना चाहता है। सेकंडरी स्टील उत्पादों के मुकाबले टाटा स्टील की कीमतें 15 फीसदी प्रीमियम पर रहती हैं।