bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

बेमानी है अनुमोदन पर विवाद

दृष्टिकोण. capital बीते 21 जुलाई को संसद में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए गए विश्वास प्रस्ताव की खिलाफत करते हुए विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अनुबंधों की तरह कुछ निर्धारित तरह के अंतरराष्ट्रीय करार करने से पहले संसद का अनुमोदन अनिवार्य बनाने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए।

जबसे भारत-अमेरिका परमाणु करार के मसौदे पर बहस शुरु हुई है, इसके संसद से अनुमोदन की मांग करने वाले लोग कम नहीं हैं। कुछ लोगों ने इसे सुनिश्चित करने के लिए संविधान संशोधन का प्रस्ताव भी दिया, आडवाणी ने बस इस सुझाव को सही तरीके से पेश किया।

यह किसी राजनीतिक समस्या के लिए संस्थागत या वैधानिक कार्रवाई का जरिया तलाशने की पुरानी प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करता है, जैसे कि कमेटी गठित करना, एक जांच आयोग बिठाना या कानून बदलना या खुद संविधान में परिवर्तन। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक लोकतांत्रिक सरकार ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय करार को अंजाम देकर संसद और जनता के प्रति जवाबदेही से बच सकती है?

इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने इसलिए विश्वास मत पेश किया, क्योंकि राष्ट्रपति ने उनसे ऐसा करने के लिए कहा। चूंकि उनके समर्थक वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया था, लिहाजा उन्हें बहुमत साबित करना था। इसके बावजूद ऐसा नहीं था जो विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने से या मसौदे को अस्वीकार करने अथवा इसकी निंदा में स्थगन प्रस्ताव से रोकता हो। इन तीनों में से किसी भी सूरत में सरकार इस्तीफा देने के लिए बाध्य होती। 3 जुलाई 1972 को हुआ शिमला समझौता अनुमोदन के लिए पेश नहीं किया गया। लेकिन दोनों संबंधित सरकारों ने अपनी संसद का सामना किया और उसका समर्थन हासिल किया। बहस के दौरान दोनों नेताओं ने आलोचना के जवाब में शिमला समझौते पर अपनी राय बेहतर तरीके से रखी।

इस संदर्भ में 2 अगस्त 1972 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा में कहा, ‘मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि वे संयुक्त राष्ट्र में जाते हैं या नहीं.. हम उनसे वहां भी मिल सकते हैं। मुझे संयुक्त राष्ट्र में उनके किसी तरह के आरोप या आलोचना का कोई भय नहीं है।’ उनके पाकिस्तानी समकक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी उतना ही यथार्थवाद दर्शाया जब उन्होंने नेशनल एसेंबली में कहा, ‘शुरुआत में हम संयुक्त राष्ट्र की अवधारणा पर रोमांचित थे.. आप जानते ही हैं कि हमने संयुक्त राष्ट्र से क्या पाया है..1964 में संयुक्त राष्ट्र तो पाकिस्तान को जवाब देने के लिए भी तैयार नहीं था.. और सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ने क्या कहा था?’ उन्होंने कहा, ‘भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय वार्ता होनी चाहिए।’

संसदीय लोकतंत्र ब्रिटिश मॉडल का अनुसरण करते हैं। संसद का अनुमोदन एक विकल्प है, कोई कानूनी बाध्यता नहीं। हालांकि राजनीतिक तौर पर यह अपरिहार्य है। अंतरराष्ट्रीय करार हमेशा अनुमोदन के लिए पेश नहीं किए जाते। वे या तो दस्तखत के जरिए या फिर सरकार के अनुमोदन के साथ ही लागू हो सकते हैं। संधियां तकरीबन अपरिहार्य रूप से उनकी मंजूरी के लिए पेश की जाती हैं, लेकिन यह बाध्यता नहीं है कि ऐसा विधायिका द्वारा होना चाहिए। सरकार भी उन पर मोहर लगा सकती है।

यह संधि करने वाले प्रत्येक राष्ट्र की पंसद का मामला है। इसके अलावा संधि का घरेलू स्तर पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं है। इसे लागू करने के लिए कानून जरूरी है, जैसे यदि वह पर्यावरण से संबंधित हो। अमेरिका में संधियों पर सीनेट का अनुमोदन जरूरी है। अनुमोदन के बाद वे पूर्व के कानून के स्थान पर कानूनी शक्ति अर्जित कर लेती हैं। इससे बचने के लिए राष्ट्रपति ‘एक्जीक्युटिव एग्रीमेंट्स’ कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के दोनों सदन- सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स- अधिकार-विहीन नहीं है। यह राजनीति ही है जो निर्धारित करती है कि कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाए। अपनी खंडित-विभाजित नीति और विदेशी ताकतों पर अविश्वास के परिप्रेक्ष्य में नेपाल के 1990 के लोकतांत्रिक संविधान में एक विशेष प्रावधान है जो किसी और देश के संविधान में नहीं मिल सकता। यह कहता है कि ‘संधियों’ या अनुबंधों के अनुमोदन व स्वीकृति को उसी तरह अंजाम देना चाहिए, जैसा विधान द्वारा निर्धारित है।

भारत के संविधान में एक व्यापक प्रावधान है। संविधान का अनुच्छेद 253 केंद्र को पूर्ण स्वायत्तता देता है: ‘इस अध्याय(विधायी दायरे में केंद्र-राज्य के संबंधों पर) के पूर्ववर्ती प्रावधानों में निहित बातों के बावजूद, संसद को समग्र भारत या इसके किसी भी हिस्से के लिए कानून बनाने, किसी भी अन्य देश/देशों के साथ हुई संधि, करार या समझौते अथवा किसी भी अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस, संघ या अन्य किसी निकाय में किए गए निर्णय को क्रियान्वित करने का अधिकार है।’ यह इटैलिक शब्द संविधान सभा में किसी चर्चा के बगैर 14 अक्टूबर 1949 को जोड़े गए। किसी ने इसके व्यापक प्रभाव को महसूस नहीं किया।

यदि भारत सरकार स्वास्थ्य जैसे किसी खास मसले पर अंतरराष्ट्रीय इकरारनामे को अंजाम देती है, तो संसद के पास यह अधिकार है कि वह इसे क्रियान्वित करने के लिए कानून बना सकती है, इस तथ्य के बावजूद कि यह राज्यों की अधिकार सूची का विषय है। इसके अलावा यह न सिर्फ किसी करार पर लागू होता है वरन किसी अंतरराष्ट्रीय ‘कांफ्रेंस’, ‘संघ’ या ‘किसी अन्य निकाय’ में किया गया कोई ‘निर्णय’ भी इसके दायरे में आता है।

पाकिस्तान का संविधान भी इसी नतीजे पर पहुंचता है। फेडरल लेजिस्लेटिव लिस्ट की प्रविष्टि-३ ‘विदेशी मामलों’ और ‘दूसरे देशों के साथ शैक्षणिक और सांस्कृतिक संधियों और समझौतों समेत बाकी समझौतों को क्रियान्वित करने’ से संबद्ध है। इस तरह किसी समझौते को क्रियान्वित करने संबंधी विधान प्रांतीय विधानों पर हावी हो जाएगा।

साफ है कि अनुमोदन पर विवाद गैरजरूरी और अवास्तविक है। भारतीय संसद में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के दिनों से ही हमेशा राजनीतिक प्रकृति के समझौतों पर बहस होती है और उन पर स्वीकृति ली जाती है। यदि भारत पाकिस्तान के साथ कश्मीर मसला या चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाता है तो क्या कोई यह मान सकता है कि इसे संसद के समक्ष स्वीकृति के लिए पेश नहीं किया जाएगा? -लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: