संपादकीय. जम्मू और कश्मीर की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन? इस पर बहस तो लंबी हो सकती है, लेकिन जाहिर तौर पर इस वक्त यह देश के हित में नहीं है। पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता है राज्य में अमन-चैन बहाल करने की।
असंतोष और हिंसा के चलते पूरी कश्मीर घाटी में तेरह वर्षो बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा, यह सरकार की लाचारी को ही दिखाता है। कफ्र्यू के बावजूद कश्मीर घाटी में कई जगह स्थानीय लोग सड़क पर उतर आए और सुरक्षाकर्मियों से मोर्चा लेकर उन्हें खदेड़ रहे हैं। लाचार पुलिस और सरकार को घाटी की अवाम ने गोलियों और कफ्र्यू का सहारा लेने के लिए मजबूर कर दिया है।
हो सकता है कि अलगाववादी तत्वों ने कश्मीर घाटी के व्यापारियों को पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से की ओर कूच करने के लिए उकसाया हो। लेकिन यह ध्यान रखना पड़ेगा कि यह स्थिति जम्मू बंद के लंबा खिंचने के कारण पैदा हुई। जम्मू के लोगों की शिकायत जायज है कि केंद्र की सरकारों ने, चाहे वे यूपीए की हों या एनडीए की, उनकी उपेक्षा की।
लेकिन उनकी लड़ाई राज्य और केंद्र सरकार से होनी चाहिए थी, न कि कश्मीर घाटी के लोगों के खिलाफ। अगर समझदारी से काम लिया गया होता तो शायद इस लड़ाई में जम्मू के लोगों को श्रीनगर और कश्मीर घाटी के लोगों का भी साथ मिल सकता था। लेकिन इस आंदोलन ने जम्मू और श्रीनगर के बीच के फासले को एक ही महीने में बढ़ा दिया है।
यह समझ में नहीं आता कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, सरकार को सर्वदलीय सहमति क्यों चाहिए। एक पूर्व प्रधानमंत्री के लफ्जों को दोहराएं तो दिल्ली की सरकार को अपने राजधर्म का पालन करना चाहिए और इसके लिए सरकार को किसी की सहमति की जरूरत नहीं है। सरकार को वे सारे कदम तुरंत उठाने चाहिए, जिनसे स्थिति को काबू में किया जा सके।
जम्मू के लिए एक आर्थिक पैकेज और वहां के लोगों की शिकायतों की जांच करने के लिए अफसरों की समिति बनाना, उन चंद कदमों में प्रमुखता से शामिल हो सकता है। किसी भी तरह सरकार को जम्मू से श्रीनगर जाने वाली सड़क पर रोड ब्लॉकेड तुरंत उठवाना चाहिए और जो लोग इसका विरोध कर रहे हों, उनसे सख्ती से निपटना चाहिए। यह सब कुछ करने के लिए केंद्र सरकार सक्षम है। जरूरत है तो बस इच्छाशक्ति की और इसके लिए किसी सर्वदलीय बैठक की जरूरत नहीं होती।