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सृजनात्मक या क्रिएटिव पूंजीवाद की दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है, लेकिन अच्छी बात यह है कि पूंजीवाद पहले ही सृजनात्मक हो चुका है। कुछ कंपनियों ने जिंदगी बदलने वाली मोबाइल फोन जैसी प्रौद्योगिकी के जरिये गरीबों के बीच बाजारों की तलाश की है। हमने देखा है कि कैसे वे बाजार साधने के साथ-साथ जिंदगी बदलने का अच्छा काम भी कर सकती हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा।
कुछ साल पहले की बात है। मैं बार में बोनो के साथ बैठा हुआ था। बोनो उस योजना को लेकर काफी उत्तेजित थे जिसके तहत कंपनियों को दुनिया की गरीबी और बीमारियों को दूर करने में मदद करने के लिए साथ लाना था। उन्होंने कई वरिष्ठ कंपनी अधिकारियों के निजी नंबरों पर फोन काल किए। उनके साथ बातचीत को बोनो मुझे भी सुना रहे थे। उन अधिकारियों की प्रतिक्रिया शांत, लेकिन उत्साहजनक थी। उसी रात ‘रेड’ नामक अभियान का जन्म हुआ।
आज गैप, हॉलमार्क और डेल जैसी कंपनियां रेड-ब्रांडेड उत्पाद बेचकर उससे होने वाली कमाई का एक हिस्सा एड्स से लड़ने के अभियान के लिए दान करती हैं। माइक्रोसॉफ्ट भी हाल ही में इस अभियान से जुड़ी है। यह एक बहुत ही सकारात्मक बात है कि कंपनियां अपने लाभ में से एक हिस्सा जनहित में लगाती हैं, उपभोक्ता भी अच्छे कार्यो के लिए सहयोग देने में खुशी महसूस करते हैं। इससे कई जानें बचाई जा सकी हैं।
पिछले करीब डेढ़ साल में ‘रेड’ ने एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक फंड के वास्ते 10 करोड़ डॉलर जुटाए हैं। सृजनात्मक पूंजीवाद कोई नया आर्थिक सिद्धांत नहीं है और न ही यह पूंजीवाद पर कोई प्रहार है। यह तो इस बेहद अहम सवाल का जवाब देने का प्रयास भर है कि पूंजीवाद के लाभों को किस प्रकार से एक बड़े वर्ग तक प्रभावी तौर से पहुंचाया जा सकता है और कैसे उन लोगों का जीवन स्तर सुधारा जा सकता है जिन्हें हम हाशिये पर छोड़ आए हैं।
दुनिया बेहतर हो रही है
पिछले सौ सालों में कई देशों में औसत आयु नाटकीय रूप से बढ़ गई है। अब पहले से ज्यादा लोग चुनावों में वोट डालते हैं, अपने विचार व्यक्त करते हैं और आर्थिक आजादी का आनंद उठाते हैं। आज हम कई समस्याओं से घिरे हैं, लेकिन उनके बावजूद पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। दिक्कत यह है कि दुनिया बहुत तेजी से बेहतर नहीं हो रही है और हरेक के लिए बेहतर नहीं हो रही है।
एक अरब लोग एक डॉलर प्रतिदिन से कम में गुजर-बसर करते हैं। उन्हें पर्याप्त पोषक आहार, स्वच्छ पानी या बिजली नसीब नहीं है। लाखों जिंदगियों को बेहतर बनाने वाले टीकों और माइक्रोचिप जैसे अद्भुत आविष्कारों का उनकी जिंदगी से कोई वास्ता नहीं है। यहीं सरकारों और गैर-मुनाफे वाले संस्थानों की भूमिका है। मेरी राय में मानव शक्ति की दो बड़ी ताकतें हैं-स्वहित और दूसरों की परवाह। पूंजीवाद स्वहित को टिकाऊ और मददगार ढंग से पूरा करता है लेकिन सिर्फ उन्हीं के लिए जो कीमत अदा कर सकते हैं। सरकारी सहायता और हमारे लोककल्याण के चैनल उन लोगों पर ध्यान दे रहे हैं जो कीमत अदा नहीं कर सकते।
एड्स, गरीबी और अशिक्षा जैसी बड़ी असमानताओं पर दुनिया स्थायी तरक्की तभी कर सकती है, जब सरकारें और गैर-मुनाफे वाले संगठन ज्यादा से ज्यादा सहायता दें और प्रभावी सहायता दें। लेकिन सुधार तेजी से तभी आएगा और तभी टिकाऊ होगा जब हम बाजार की ताकतों को इस लड़ाई में शामिल कर सकें, जब वे सबसे गरीब लोगों की जरूरतों के अनुरूप नई चीजें ईजाद कर सकें। आज हमें ऐसी प्रणाली की जरूरत है जो उद्योगपतियों और आविष्कारकों को इस कार्य में कहीं बेहतर ढंग से संलग्न कर सके।
जो छूट गया है
सी के प्रहलाद अपनी किताब द फॉचरून एट द बॉटम ऑफ द पिरामिड में बताते हैं कि दुनिया भर में ऐसे बाजार हैं जो व्यवसायियों से छूट गए हैं। एक अध्ययन से पता चला कि दुनिया की सबसे गरीब दो-तिहाई आबादी के पास 5 ट्रिलियन डॉलर की खरीद क्षमता है। बाजार की ताकतें विकासशील देशों में ज्यादा असर पैदा नहीं कर सकी हैं तो इसका एक मुख्य कारण यह है कि हमने उन बाजारों की जरूरतों को समझने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
मुझे पता है, मैंने माइक्रोसॉफ्ट में यह होते हुए देखा है। कई सालों तक माइक्रोसॉफ्ट वंचित लोगों तक टेक्नोलॉजी को पहुंचाने के लिए कारपोरेट जनकल्याण का प्रयोग करता रहा। उसने डिजीटल खाई को पाटने की कोशिश में 3 अरब डॉलर नकद और सॉफ्टवेयर दान दिए। लेकिन हमारी असली विशेषज्ञता समस्याएं हल करने वाले सॉफ्टवेयर बनाने की है। हम विजुअल इंटरफेस जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं, जिनसे निरक्षर या कम पढ़े-लिखे लोग भी बहुत कम प्रशिक्षण से कंप्यूटर का इस्तेमाल कर सकेंगे।
हमारा एक और प्रोजेक्ट यह है कि छात्रों से भरी पूरी कक्षा एक ही कंप्यूटर का प्रयोग कर सके : हमने ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया है जिसमें एक खास रंग के कर्सर को हरेक बच्च अपने माउस से कंट्रोल कर सकता है और इस तरह पचास बच्चे एक ही समय एक ही कंप्यूटर पर काम कर सकते हैं। यह उन स्कूलों के लिए बड़ी उपलब्धि है जहां पर्याप्त कंप्यूटर नहीं हैं और यह वह बाजार है जिस पर हमने पहले ध्यान नहीं दिया। दूसरा उदाहरण सेलफोन का है।
विकासशील देशों में अब उनका शानदार बाजार है, लेकिन इतिहास में कंपनियों ने इन बाजारों को बहुत कम करके आंका। 2000 में जब वोडाफोन ने एक केन्याई कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी खरीदी थी, तब उसने पाया कि केन्या में ज्यादा से ज्यादा 4 लाख उपयोगकर्ताओं का बाजार होगा। आज उस कंपनी सफारीकॉम के पास 1 करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ताओं का बाजार है। कंपनी ने कम आमदनी वाले केन्याई लोगों तक पहुंचने के सृजनात्मक तरीके ईजाद करके यह पाया है। मसलन, वह अपने ग्राहकों से मिनट के बजाय सेकंड के आधार पर चार्ज करती है जिससे कीमत कम रहती है।
अवसरों का लाभ उठाएं
यही वह तरीका है जिसके जरिये उद्योगपति उन अवसरों को भुना सकते हैं जिनसे वे अब तक वंचित रहे हैं। लेकिन इस साल की शुरुआत से मैंने जबसे सृजनात्मक पूंजीवाद के बारे में बात करना शुरू किया है, तभी से कुछ लोग इस बात को लेकर संदेह जताते आ रहे हैं कि इस प्रकार का कोई नया बाजार भी हो सकता है। उनका तर्क है कि अगर इस तरह का कोई बाजार वाकई होता तो अब तक कोई न कोई उसकी खोज कर चुका होता।
मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। उनकी बातों से तो ऐसा लगता है कि उद्यमी अपने उत्पादों के लिए सभी संभव बाजारों का अध्ययन कर चुके हैं। उन्हें यह भी लगता है कि तमाम अवसरों को तो पहले ही भुना लिया गया है। अगर हम यह मौका गंवा देते हैं तो यह बहुत ही शर्मनाक होगा। इसके बजाय अगर कंपनियों के अनुसंधानकर्ता और रणनीतिकार गरीबों की जरूरतों को समझने वाले विशेषज्ञों के साथ नियमित तौर पर बैठक करें तो स्थिति में काफी परिवर्तन आ सकता है।
कंपनियां कई बार गरीबों को अपने उत्पादों तक पहुंच के लिए उसमें छूट देकर भी उन्हें लाभ पहुंचा सकती हैं। सॉफ्टवेयर और दवाइयां बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत बहुत कम होती है। ऐसी कंपनियां अमीर बाजारों में अपने उत्पादों पर भारी लाभ कमा सकती हैं, जबकि गरीबों को बाजारों में इन्हें कम कीमत में या लागत दामों पर बेचा जा सकता है। ‘रेड’ अभियान में शामिल कंपनियां नए ग्राहकों को आकर्षित करती हैं जो किसी अच्छे काम से जुड़ना चाहते हैं। इस तरह से एक ऐसी स्थिति आ सकती है जहां लोग अन्य उत्पादों की जगह एक खास उत्पाद को तरजीह दें।
अच्छा काम करने वाले व्यवसायों के लिए एक और बड़ा फायदा हो सकता है। उनके लिए बहुत अच्छे कर्मचारियों की भर्ती और उन्हें कायम रखना बहुत आसान हो जाएगा। दुनियाभर में आज नौजवान ऐसे संगठनों के लिए काम करना चाहते हैं जिनके बारे में वे अच्छा महसूस कर सकते हैं। उन्हें बताइए कि एक कंपनी अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल दुनिया के निर्धनतम लोगों की मदद के लिए कर रही है और वे आपकी इस प्रतिबद्धता का जवाब खुद अपने समर्पण से देंगे।
नए प्रोत्साहनों की रचना
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वर्तमान दौर में व्यवसाय करना कितना कठिन है या लोग कितने रचनात्मक ढंग से सोच पाते हैं। दुनिया में कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जिनका हल मौजूदा बाजार के पास नहीं है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मलेरिया। जिन लोगों को मलेरिया की दवा और टीकों की सबसे ज्यादा जरूरत है, उनके पास खरीदने के लिए पैसे ही नहीं हैं। इसलिए दवाइयां और टीके बनते भी नहीं हैं। ऐसे में सरकार और गैर-मुनाफे वाली संस्थाएं कुछ प्रोत्साहन दे सकती हैं।
यह वह दूसरा रास्ता है, जिसके सहारे सृजनात्मक पूंजीवाद अपने पंख पसार सकता है। यह प्रोत्साहन सहज-सरल रूप से उन कंपनियों को दिया जाए, जो निर्धनों की सेवा के लिए काम कर रही हैं। इन गर्मियों में एक गैर-मुनाफे वाली डच संस्था एक्सेस टू मेडिसिन फाउंडेशन ने एक रिपोर्ट कार्ड प्रकाशित करना शुरू किया जिससे पता चला कि विकासशील देशों में लोगों की दवाओं की जरूरत को पूरा करने के लिए कौन-सी दवा कंपनी सर्वाधिक कार्य कर रही है।
जब मैं दवा कंपनियों के कार्यकर्ताओं से बात करता हूं तो वे कहते हैं कि वे उपेक्षित और हाशिए पर पड़ी बीमारियों के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कम से कम इसका श्रेय तो मिले। यह रिपोर्ट कार्ड यही श्रेय देने का काम करता है। प्रचार और प्रसिद्धि बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कई बार ऐसे कामों में अपनी ऊर्जा झोंकने के लिए इतना ही प्रोत्साहन काफी नहीं होता। हो सकता है कि सबसे जानी-मानी कंपनी भी 10 सालों से किसी नई दवा के शोध के खर्चे पूरे न कर पाई हो। ऐसे में जरूरी है कि सरकार उन्हें ज्यादा से ज्यादा आर्थिक प्रोत्साहन दे।
जैसे कि पिछले वर्ष बने एक अमेरिकी कानून के मुताबिक कोई दवा कंपनी किसी उपेक्षित बीमारी (जैसे मलेरिया) के लिए कोई नई दवा खोजती है तो उस कंपनी द्वारा बनाई गई अगली दवा को फूड एंड ड्रग्स कॉपरेरेशन द्वारा अधिक वरीयता दी जाएगी। बेशक, विकासशील देशों में अभी सरकारों को पूंजीवाद को आगे बढ़ाने के लिए बहुत काम करना है। उन्हें ऐसे नियम-कानून बनाने चाहिए, जिससे बाजार का विकास हो, ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक प्रगति का लाभ मिल सके।
वस्तुत: सृजनात्मक पूंजीवाद के खिलाफ मैंने एक और तर्क सुना है : ‘हमें पूंजीवाद को और सृजनात्मक बनाने की जरूरत नहीं है। जरूरी है कि सरकारें इसमें अपना हस्तक्षेप समाप्त कर दें।’ इस दिशा में भी कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। बहुत से देश अपने राष्ट्र की सीमाओं में और उसके बाहर भी हो रहे व्यावसायिक निवेश में चकाचौंध ला सकते हैं, अगर वे जन अधिकारों को सुरक्षित करने और लालफीताशाही को खत्म करने की दिशा में और ठोस कदम उठा सकें। लेकिन यह परिवर्तन धीरे-धीरे आएंगे। इस बीच हम बैठकर इंतजार तो नहीं कर सकते। एक व्यवसायी के रूप में मैं जानता हूं कि स्थितियां बहुत आदर्श नहीं हों तो भी कंपनियां अपने लिए नए-नए बाजार विकसित कर सकती हैं।
अगला कदम
इस जून में माइक्रोसॉफ्ट में अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से मैं मुक्त हो गया, ताकि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन को अधिक से अधिक वक्त दे सकूं। मैं राजनेताओं से बात करूंगा कि कैसे उनकी सरकारें गरीब व्यक्तियों की अधिक से अधिक मदद कर सकती हैं। कैसे सृजनात्मक पूंजीवाद के नए प्रयोगों से इसे अधिक से अधिक प्रभावी बनाया जाए। मैं कंपनियों के मुख्य अधिकारियों से भी बात करूंगा कि उनकी कंपनियां इस दिशा में क्या कर सकती हैं।
एक विचार यह भी हो सकता है कि उन कंपनियों का हर नया उन्नत कदम कुछ हद तक उन लोगों के लिए लाभकारी हो, जो कहीं पीछे छूट गए हैं। कुछ दवा कंपनियां जैसे कि मर्क और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन यह काम बखूबी कर रही हैं। जापान की कंपनी सुमितोमो केमिकल ने तंजानिया की एक टेक्सटाइल कंपनी को अपनी तकनीक दी है। इस तकनीक की मदद से लाखों मच्छरदानियां बनाई जाएंगी, जिससे मलेरिया को फैलने से रोकने में मदद मिलेगी।
अन्य कंपनियां फूड, मोबाइल फोन और बैंकिंग की दिशा में ऐसे ही कदम उठा रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सृजनात्मक पूंजीवाद अपना काम कर रहा है। लेकिन हम इससे कहीं ज्यादा कुछ कर सकते हैं। सरकारें एफडीए वाउचर जैसे ढेरों प्रोत्साहन दे सकती हैं। हम रिपोर्ट कार्ड के विचार को दवा कंपनियों तक सीमित न रखकर उसे और भी आगे बढ़ा सकते हैं। हम यह भी सुनिश्चित करें कि कंपनियों का बेहतर काम आम जन तक पहुंचे और उन्हें इसका श्रेय भी मिले ताकि वे आगे और भी बेहतरीन काम करने के लिए प्रेरित हों।
जो कंपनियां अच्छा काम कर रही हैं, उपभोक्ता उनके उत्पाद खरीदकर उन कंपनियों में अपना योगदान दे सकते हैं। यह उपभोक्ताओं की तरफ से उन कंपनियों का इनाम होगा। अगर ज्यादा से ज्यादा कंपनियां उद्योग जगत के सबसे सृजनात्मक संस्थानों की राह पर चलती हैं, तो दुनिया की सबसे बदतर समस्याओं का भी हल खोजा जा सकेगा।
यह आलेख टाइम पत्रिका के साथ विशेष व्यवस्था के तहत प्रकाशित किया जा रहा है।कॉपीराइट 2008 टाइम एशिया।