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उम्र कम, लेकिन जिद, जज्बा, जुनून बहुत ज्यादा

मुंबई.दुनिया में आमतौर पर परोपकार का जज्बा एक परिपक्व उम्र और कमाई के स्थिर होने के बाद ही देखने को मिलता है। इस लिहाज नैवेद्य अग्रवाल कुछ अलग ही कहा जाएगा, क्योंकि महज 19 बरस की उम्र में वह अंगभंग या विकलांगता का शिकार हो चुके लोगों के लिए उम्मीद का दिया बनकर सामने आया है। परोपकार की उसकी जिद और जज्बा सभी के लिए प्रेरणा बन सकता है।

सिंगापुर में पढ़ने वाला यह भारतवंशी बच्च इन दिनों यहां आया हुआ है और यहां के केईएम अस्पताल में जयपुर फुट और प्रोस्थेटिक लिंब का शिविर आयोजित कर रहा है। उड़ीसा के लांजीगढ़ जिले के अलावा अफ्रीकी देश जांबिया के चिंगोला जिले में भी ऐसे ही कैंप आयोजित कर चुका नैवेद्य अपनी उम्र के फिल्मों, रईसी और मौज-मस्ती में मस्त रहने वाले किशोरों से बिलकुल अलहदा है।

परोपकार के साथ पढ़ाई को भी जारी रखने वाला नैवेद्य इस वक्त न्यूयार्क यूनिवर्सिटी से बिजनेस के गुर सीख रहा है।

उसे उम्मीद है कि उसके ताजा कैंप से कम से कम 100 विकलांगों को अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। नैवेद्य की सोच और परोपकार केवल कैंप के आयोजन तक ही सीमित नहीं है, उसने अमेरिका में इंटर्नशिप से कमाए एक लाख रुपए भी इस कैंप के आयोजन पर खर्च कर दिए हैं।

इस कैंप के लिए उसे तकरीबन ढाई लाख रुपए की दरकार थी। उसने इसके लिए अपने सिंगापुर के स्कूल में खुद जाकर बहुत ही मार्मिक अपील की और लोगों ने उसकी जिद, जोश और जज्बे को देखकर साढ़े तीन लाख रुपए तक की राशि दान कर डाली। परोपकार का यह जज्बा नैवेद्य को बचपन में ही दादाजी से मिल गया था।

वह जब अपने बचपन को याद करता है तो उसे अपने दादाजी दिखाई देते हैं जिनकी ऊंगली थामे वह उस नन्हीं उम्र में भी दृष्टिहीनों की मदद के लिए दादाजी द्वारा आयोजित कैंपों में जाया करता था। इतना सबकुछ करके भी नैवेद्य कई बातों में आम किशोरों जैसा है।

उसे टेनिस खेलना पसंद है और वह क्रिकेट का भी दीवाना है। किताबें पढ़ने को भी काफी वक्त देने वाला नैवेद्य मर्डर मिस्ट्री पसंद करता है और जॉन ग्रिशाम, नोरा रॉबर्ट्स उसके पसंदीदा राइटर हैं। अपने पिता के साथ बिजनेस ट्रिप पर जाने वाला नैवेद्य जहां भी जाता है यही जानने का प्रयास करता है कि वह किस तरह से उस जगह के लोगों की जिंदगी





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