मुंबई.महाराष्ट्र के संपन्न दंपती लिंग परीक्षण रोक कानून और गर्भपात के जोखिम व अपराध बोध से बचने के लिए थाईलैंड, मलेशिया और अमेरिका के आईवीएफ सेंटरों पर जाकर गर्भधारण के पहले ही बेटे का जन्म सुनिश्चित कर रहे हैं। राज्य के ढेर सारे फर्टीलिटी क्लीनिक उन्हें विदेशों में उचित आईवीएफ सेंटर खोजने में मदद करते हैं।
संपन्न परिवारों की महिलाएं विदेशी सेंटरों में जाकर इनव्रिटो फर्टीलाइजेशन तकनीक से गर्भधारण करती हैं। भारत लौटने के बाद वे यथासमय बेटों को जन्म देती हैं। गौरतलब है कि भारत में भ्रूण का लिंग परीक्षण ‘जन्म पूर्व लिंग परीक्षण तकनीक अधिनियम’ के अंतर्गत दंडनीय है।
छह लाख का खर्च : मुंबई के एक आईवीएफ विशेषज्ञ ने ऐसे एक दंपती का पता लगाने में मदद की। पहचान जाहिर न करने की शर्त पर ये दंपती बातचीत के लिए राजी हुए। पति ने बताया, ‘हवाई यात्रा समेत इस पूरी प्रक्रिया में करीब छह लाख रुपए का खर्च आया। मुंबई के एक आईवीएफ विशेषज्ञ ने इसमें अहम भूमिका निभाई।’
बेटे की चाह :
दंपती ने दावा किया कि उनका इरादा कन्या भ्रूण को मारने के बजाए पुत्र को जन्म देना था। महिला ने कहा, ‘मेरे दिमाग में यह बात बिल्कुल साफ थी कि अगर मैं दोबारा मां बनूंगी तो होने वाला बच्च बेटा ही होगा।’
हर साल आते हैं 50 जोड़े : इस संबंध में जसलोक अस्पताल और रिसर्च सेंटर की डॉ. फिरूजा आर पारीख ने कहा, ‘प्रति वर्ष हमारे पास औसतन 50 जोड़े आते हैं, जो गर्भधारण के पहले ही भ्रूण कालिंग निर्धारण कराना चाहते हैं। मैं उन्हें यह समझाने का प्रयास करती हूं कि बेटी भी बेटे जैसी प्रतिभाशाली होती है। मैंने उन्हें वे आंकड़े भी दिखाए, जिसमें यह दिखाया गया था कि लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। हालांकि इनमें से कोई भी दंपती लौटकर हमारेपास नहीं आया।’
बिखर जाएगा सामाजिक तानाबाना डा. पारीख ने कहा, ‘इस चलन से हमारे समाज का तानाबाना बिखर जाएगा। इसकी सामाजिक कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी होगी।’
‘लिंग निर्धारण के लिए हमारे पास कई दंपती आते हैं, लेकिन हम उनकी कोई मदद नहीं करते हैं।’
डॉ. ऋ षिकेष पई (लीलावती अस्पताल में कार्यरत आईवीएफ विशेषज्ञ)
लिंग अनुपात निम्नतम स्तर पर महाराष्ट्र में लिंग अनुपात अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। राज्य में प्रति 1000 पुरुषों पर 922 महिलाएं हैं। शहरी क्षेत्र के मुकाबले ग्रमीण क्षेत्र में यह अनुपात ज्यादा है। छह वर्ष की उम्र के बच्चों में 1000 लड़कों पर 913 लड़कियां हैं। यह रुझान भविष्य के लिए काफी चिंताजनक है।