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प्रायश्चित से तपी प्रेमकथा

परदे के पीछे.भारतीय मनोरंजन उद्योग के लिए खुशी की बात है कि आदित्य चोपड़ा की असफल फिल्मों का दौर रुक गया है और उन्हें ‘बचना ए हसीनों’ में कुछ सफलता मिली है। दूसरी खुशी की बात है कि ‘सांवरिया’ की असफलता से कुछ हद तक रणवीर कपूर मुक्त हुए हैं।

अफसोस की बात यह है कि कुछ युवा दर्शकों को प्रायश्चित करता हुआ नायक हजम नहीं हो रहा है। हमने समाज में आनंद और उत्सव का विराट भ्रम खड़ा किया है और इसमें प्रायश्चित करता हुआ नायक इन्हें यथार्थ का स्मरण कराता है जिसके कारण इनका यूफोरिया(स्वस्थ होने का भ्रम) टूटता है।

कुछ इसी तरह की बात ‘वीर-जारा’ के समय भी हुई थी कि युवा वर्ग को नायक के बीस वर्ष की सजा हजम नहीं हुई गोयाकि उनकी इच्छा थी कि नायक और नायिका जवानी या अधेड़ अवस्था में ही मिल जाते तो बेहतर था, क्योंकि देहेतर प्रेम में इनका कोई विश्वास नहीं है। प्रेम और यौन संबंध की विक्षिप्त परिभाषा से पीड़ित युवा दर्शक को नायक का पश्चाताप वाला अंश अखरता है, जो कि मूल कथा है। शायद इसी कारण यह सार्थक प्रेमकथा सफल होते हुए भी बॉक्स ऑफिस पर कोई कीर्तिमान नहीं बना पा रही है गोयाकि समाज में व्याप्त लंपटता का खामियाजा इसे भुगतना पड़ रहा है।

यह अजीब बात है कि अनुभवी फिल्मकार भी रणवीर कपूर की फिल्मों में उनके पिता ऋषि कपूर या दादा राज कपूर की फिल्मों की याद को जोड़ना चाहते हैं और एक विरासत को बॉक्स ऑफिस पर भुनाने के चक्कर में अपनी अच्छी कथा के साथ भी समझौता कर लेते हैं, मसलन भंसाली ने ‘सांवरिया’ में तौलिए का दृश्य डाला और जगह-जगह दर्शक को याद दिलाने की चेष्टा की कि उनका नायक राज कपूर का पोता है। आदित्य चोपड़ा ने ऋषि कपूर की फिल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ का गीत ‘बचना ए हसीनों’ का रीमिक्स ही नहीं प्रस्तुत किया वरन प्रेम, वासना और प्रायश्चित को रेखांकित करने वाली फिल्म का नाम रखा ‘बचना ए हसीनों’ जो हल्का-फुल्का निर्थक नाम है।

बहरहाल रणवीर ने लापरवाह लंपट युवा के रूप में लोकप्रिय अभिनय किया है और प्रायश्चित के दृश्यों को भी निभाने का गंभीर प्रयास किया है। निर्देशक से उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। आजकल हर वह आदमी निर्देशक बन सकता है जो एक सितारे को अनुबंधित करा सके। बहरहाल निर्देशक आनंद ने अपनी दो असफल फिल्मों (सलाम नमस्ते और तारा रम पम) से बहुत कुछ सीखा है और यह उनका बेहतर प्रयास है। यह मुमकिन है कि पैकेजिंग के मोह से उभरकर वे असल माल के परिमार्जन में लगें।

इस फिल्म में हास्य अभिनेता पेंटल के सुपुत्र ने रणवीर के मित्र की भूमिका आत्मविश्वास से निभाई है। ‘रंग दे बसंती’ के कलाकार कुणाल ने एक समझदार सरदार पति की भूमिका अत्यंत विश्वसनीयता से निभाई है। तीन नायिकाओं में बिपाशा का अभिनय श्रेष्ठ है क्योंकि उसका चरित्र-चित्रण अच्छे ढंग से किया गया है।

उसका संवाद गौरतलब है कि प्रेम में धोखा खाने के बाद उसे एक विकल्प के रूप में सफलता अर्जित करने का जुनून सवार हो गया था। क्या प्रेम का कोई विकल्प हो सकता है। आज की युवा पीढ़ी सफलता अर्जित करना चाहती है और उनके इसी जुनून का एक हिस्सा प्रेम भी हो गया है। इस फिल्म ने कई सवाल उठाए हैं।





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