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अपना बोया ही काटा मुशर्रफ ने

लगता है परवेज मुशर्रफ अब भी ख्वाबों की दुनिया में जी रहे हैं। राष्ट्र के नाम अपने संबोधन से पहले उन्होंने अपने एक मित्र से कहा कि गठबंधन सरकार के दल जल्दी ही आपस में लड़ना-झगड़ना शुरू कर देंगे और उनकी गैर मौजूदगी में देश में अस्थिरता और बढ़ जाएगी। इससे त्रस्त होकर जनता छह माह के भीतर ही ‘मुशर्रफ वापस लाओ’ की मांग करने लगेगी। यही वजह है कि मुशर्रफ पाकिस्तान से बाहर नहीं जा रहे हैं।

मुशर्रफ को यह भारी गलतफहमी है। उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा राजनीतिक दबाव में ही दिया है। पाकिस्तान की जनता तो इसी साल 18 फरवरी को उन्हें अस्वीकार कर चुकी थी।

सोमवार के भाषण में उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1999 में पाकिस्तान को ‘आतंकवादी देश’ लगभग घोषित कर ही दिया गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा होने से बचा लिया। हालांकि उन्होंने कारगिल युद्ध और बेनजीर हत्याकांड का कोई जिक्र नहीं किया जिसकी वजह से दुनियाभर में पाकिस्तान की किरकिरी हुई थी। वैसे, मुशर्रफ और मनमोहन सिंह कई दौर की बातचीत के बाद कश्मीर समस्या के लीक से हटकर समाधान के लिए प्रयासरत थे।

भारतीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन और पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार तारिक अजीज के बीच दुबई में कूटनीतिक चर्चा भी जारी थी। भारतीय खेमे ने पीडीपी के महबूबा मुफ्ती वाले धड़े को समझाने में तो पाकिस्तानी पक्ष कश्मीर के अलगाववादी नेता मीर वाइज, उमर फारुख और यासीन मलिक को वर्ष 2007 में कश्मीर समस्या के समाधान के लिए मनाने में सफल रहा।

कश्मीर समस्या के समाधान की बारीकियों के ड्राफ्ट को जून 2006 में ही अंजाम दे दिया गया था। मुशर्रफ चाहते थे मनमोहन सिंह पाकिस्तान आएं, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री उचित अवसर की तलाश में थे। लेकिन दुर्भाग्य से 2006 में कुछ नहीं हो पाया और 2007 शुरू हो गया। यही वह वर्ष था जब मुशर्रफ ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त कर उन्हें गिरफ्तार करा दिया। यह कदम उनके लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ। मुशर्रफ 20 जुलाई 2007 को अदालती लड़ाई हार गए और अदालत ने चीफ जस्टिस को बहाल कर दिया।

मुशर्रफ इस कानूनी हार को पचा नहीं पाए। ऐसे में उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से निर्वासित जीवन जी रहीं विपक्षी नेता बेनजीर भुट्टो से एक समझौता किया। इस क्रम में अक्टूबर में बेनजीर स्वदेश वापस आ गईं, लेकिन उनके और मुशर्रफ के बीच अविश्वास के कई मुद्दे मौजूद रहे। ऐसे में क्षुब्ध मुशर्रफ ने 3 नवंबर को देश पर आपातकाल थोप दिया। इसमें भी उनका खास निशाना सुप्रीम कोर्ट और विद्रोही मीडिया बना।

बेनजीर ने इसे मार्शल लॉ करार देते हुए मुशर्रफ से सभी तरह की बातचीत बंद कर दी। फिर 8 जनवरी 2008 को चुनाव की तिथि घोषित की गई, लेकिन बेनजीर ने चुनाव में धांधली की आशंका को लेकर जोर-शोर से आवाज उठानी शुरू की। इस क्रम में बेनजीर ने आईएसआई के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल नदीम ताज से 26 दिसंबर को मुलाकात कर उन्हें सुरक्षा संबंधी चेतावनी देते हुए सुझाव दिया कि वे अपना चुनाव अभियान रोक दें।

ताज के इस सुझाव को बेनजीर ने सिरे से ठुकरा दिया। अगले ही दिन बेनजीर की हत्या हो गई। वास्तव में बेनजीर की हत्या मुशर्रफ के लिए काल साबित हुई और उन्होंने पाकिस्तान में अपना जनाधार पूरी तरह से खो दिया।

उन्होंने चुनाव एक माह के लिए टाल तो दिया, लेकिन उनमें धांधली की उनकी योजना धरी की धरी रह गई। इसकी एक प्रमुख और महत्वपूर्ण वजह यह थी कि सेना ने इस चुनाव से अपने को किनारे कर लिया था। यहां तक कि आईएसआई को भी चुनाव से दूर रहने के लिए सैन्य प्रमुख कियानी ने बाकायदा आदेश जारी कर दिया।

उन्हें इस बात का भी पूरा भरोसा था कि वर्दी छोड़ने के बावजूद पाकिस्तानी सेना को उनकी जरूरत है। उन्होंने सोचा कि सिर्फ वे ही पाकिस्तानी सेना के लिए अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा सौदेबाजी कर सकते हैं। मुशर्रफ ने पाकिस्तान में सरकार के गठन की प्रक्रिया को एक महीने से ज्यादा समय तक टाला। उन्होंने अमेरिका के शीर्ष राजनयिकों के जरिए पीपीपी के नेता आसिफ अली जरदारी और पीएमएल(एन) के मुखिया नवाज शरीफ से समझौते करने की कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे।

पश्चिमी देशों में मुशर्रफ की लोकप्रियता कुछ हद तक अभी भी बरकरार है, लेकिन पाकिस्तान में वे सर्वाधिक अलोकप्रिय शख्स हैं। नई गठबंधन सरकार ने उनके समक्ष ऐसे कई संदेश भेजे कि वे अपने पद से हट जाएं, लेकिन मुशर्रफ ने उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर धमकाया। उनके इसी अड़ियल रवैए की वजह से मुश्किलें पैदा हरुई और आखिरकार गठबंधन के नेताओं ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की ठान ली। उनके सभी पुराने करीबियों ने उन्हें धोखा दिया।

अमेरिका और ब्रिटेन उनकी मदद करने की स्थिति में नहीं हैं। इन देशों ने गठबंधन सरकार से मुशर्रफ के खिलाफ महाभियोग की बजाय उन्हें सुरक्षित रास्ता मुहैया कराने की गुहार लगाई है। मुशर्रफ सब कुछ हार चुके हैं। उनके सभी संगी-साथी अब उन्हें अलविदा कहना चाहते हैं।

मुशर्रफ ने आठ साल से ज्यादा समय तक पाकिस्तान पर राज किया लेकिन वे कभी अपने मुल्क के लोगों के दिलो-दिमाग पर राज नहीं कर पाए। वे निश्चय ही इस स्थिति में थे कि वर्ष 2007 में मनमोहन सिंह और बेनजीर भुट्टो की मदद से शांतिदूत बन सकते थे लेकिन उन्होंने इस सुनहरे मौके को यूं ही गंवा दिया। उन्होंने इस अवसर को इसलिए गंवाया क्योंकि उन्होंने न्याय तंत्र पर हमला कर पाकिस्तान में राजनीतिक अशांति पैदा कर दी। अब वे सब कुछ गंवा चुके हैं।

जल्द ही उन्हें महसूस होगा कि पाकिस्तान में रुकने का कोई मतलब नहीं है और आखिरकार वे इस मुल्क को छोड़ देंगे क्योंकि उनके लिए अवाम का सामना करना बेहद मुश्किल होगा। वे बहुत जल्द पाकिस्तान को मिस करेंगे लेकिन पाकिस्तान का अवाम उन्हें मिस नहीं करेगा।

मुशर्रफ निश्चित ही पाकिस्तान के अंतिम सैन्य शासक थे। कई लोग उन्हें न सिर्फ एक तानाशाह की तरह वरन एक विश्वासघाती के तौर पर भी याद रखेंगे जिन्होंने एक बार नहीं वरन दो बार पाकिस्तान के संविधान को तोड़ा।
-लेखक पाकिस्तान स्थित जिओ टीवी से जुड़े हैं।





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