इंदौर. अपराधियों की धरपकड़ से लेकर सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पुलिस की एफएसएल और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट की जांच बेनतीजा रहने का कारण संसाधनों की कमी और काम का ज्यादा दबाव बताया जाता है। इसके चलते हर जगह जाने और रिपोर्ट बनाने की विभागीय खानापूर्ति तो हो रही है लेकिन नतीजे नहीं निकल रहे।
2005 से है उन्नत सॉफ्टवेयर
किसी समय अपराधियों के फिंगर प्रिंट फाइलों में रखे जाते थे जिनके मिलान में हफ्तों लगते थे लेकिन 2005 से प्रदेश के हर जिले में कम्प्यूटर के साथ ऑटोमेटिक फिंगर प्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं। ये कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर सीधे पुलिस मुख्यालय से जुड़े हैं।
हर जिले की फिंगर प्रिंट सेल के कम्प्यूटर में क्षेत्र के अपराधियों का रिकॉर्ड रहता है। कम्प्यूटर ऑपरेटर कोई भी फिंगर प्रिंट सॉफ्टवेयर में डाले तो संबंधित व्यक्ति यदि कभी अपराधी रहा है तो पलभर में जानकारी मिल जाती है। केवल घटनास्थल से आरोपी के फिंगर प्रिंट उठाने की जरूरत है लेकिन 90 प्रतिशत मामलों में खराब सतह और मौसम खराब बताकर कह देते हैं फिंगर प्रिंट नहीं मिले।
क्यों नहीं मिलते
जिले की फिंगर प्रिंट सेल में प्रभारी केके द्विवेदी, प्रधान आरक्षक गुलाम नबी, आरक्षक देवीसिंह और रामब्रजेश तैनात हैं। श्री द्विवेदी हर घटनास्थल पर फिंगर प्रिंट लेने जाते हैं लेकिन दो या तीन साल में कितने प्रिंट जुटाए इसकी जानकारी नहीं। उनका कहना है-
>> जो मिलते भी हैं वे इतने स्पष्ट नहीं होते कि कोई मदद मिले।
>> अकसर फरियादी घटनास्थल से छेड़छाड़ कर देते हैं जिससे उनके फिंगर प्रिंट बदमाशों के प्रिंट से मिल जाते हैं।
>> बारिश में और नमी वाले स्थान पर केमिकल फैल जाता है और प्रिंट नहीं मिल पाते।
>> अलमारी या खुरदरी सतह पर भी फिंगर प्रिंट पूरे नहीं बनते।
रजिस्ट्री के मिलान तो हो जाते हैं
श्री द्विवेदी कोर्ट से आए फर्जी रजिस्ट्री प्रकरणों का रिकॉर्ड भी रखते हैं। ऐसे मामलों में आरोपी के फिंगर प्रिंट मिलान कर पता लगाते हैं संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है या नहीं। ऐसे मामलों में भी फिंगर प्रिंट स्पष्ट नहीं आते इसलिए मिलान में कड़ी मेहनत करना पड़ती है। इतनी मेहनत एक्सपर्ट चोरी या लूट के घटनास्थल पर भी करे तो अपराधी का पता चल जाए।
काम का बोझ
श्री द्विवेदी भी मानते हैं घटनास्थल पर कड़ी मेहनत करें तो हर हाल में फिंगर प्रिंट मिल सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक फिंगर प्रिंट सेल पर काम का दबाव बहुत ज्यादा है। भोपाल में दो एक्सपर्ट हैं, जबकि इंदौर में एक ही। जिले के सभी थानों से हर दिन दर्जनों फिंगर प्रिंट मिलान के लिए आते हैं। एक्सपर्ट को कोर्ट पेशी पर जिले से बाहर भी जाना पड़ता है।
एफएसएल में भी स्टाफ कम
एफएसएल टीम के नाम पर इंदौर जिले में प्रभारी डॉ. सुधीर शर्मा इकलौते हैं। नियमानुसार उनके साथ उपकरणों की देखभाल के लिए एक टेक्निशियन, कैमिकल बनाने और जांच के लिए लैब असिस्टेंट और रिपोर्ट बनाने के लिए एक बाबू होना चाहिए। ये सभी काम वे अकेले ही निपटाते हैं इसलिए परिणाम अच्छे नहीं आ पाते। डॉ. शर्मा के पास प्रेस सेल का अतिरिक्त प्रभार भी है।
हत्या का आरोपी बरी
2 अप्रैल 2007 की सुबह खुटाल कॉम्पलेक्स, सुभाष चौक में सुनील वासुदेव मंडेरिया निवासी अंबिकापुरी की रक्तरंजित लाश मिली थी। सीएसपी बीजे सालुंके ने सुनील के एक दोस्त को डेढ़ हजार रुपए के लिए हत्या करने का आरोपी बताकर गिरफ्तार किया। उसने जुर्म भी कबूला।
सात महीने कोर्ट केस चला और वह ठोस सबूतों के अभाव में बरी हो गया। पुलिस ने गवाहों के पलट जाने को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि पुलिस के पास एफएसएल जांच की रिपोर्ट थी। टीम ने मौके से आरोपी के फिंगर प्रिंट भी लिए थे लेकिन कुछ भी साबित नहीं हुआ। जानकार मानते हैं गवाह पलट भी जाए तो एफएसएल की ठोस रिपोर्ट से सजा दिलाई जा सकती है।
चोरी-लूट में नहीं मिलते फिंगर प्रिंट
शहर में हर दिन औसतन एक बड़ी चोरी व महीने में एक बड़ी लूट होती है। चोर-लुटेरे खिड़की के रास्ते या दरवाजा तोड़कर-धमकाकर घुसते हैं। घर की पूरी तलाशी लेकर माल बटोर ले जाते हैं। हर घटना के बाद एफएसएल की टीम बारीकी से जांच करती है।
फोटो के साथ फिंगर प्रिंट भी लेती है। कई बार कह दिया जाता है यहां से कोई निशान नहीं मिला। आरोपी पुलिस के मुखबिरी तंत्र या घटनास्थल से मिले सुराग से ही पकड़े जाते हैं। एफएसएल रिपोर्ट कोई मदद नहीं करती।