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मुशर्रफ थे, अनूठे तानाशाह!

आलेख. mush परवेज मुशर्रफ इस्तीफा नहीं देते तो क्या करते? उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया था। यदि वे संसद में बड़ा मुकदमा लड़ते तो लगभग एक माह तक पाकिस्तान अधर में लटका रहता। सारे पाकिस्तान के गंदे चीथड़े चौराहे पर धुलते और उसका सीधा असर पाकिस्तान की अर्थ-व्यवस्था पर पड़ता। पिछले छह माह में जो डॉलर 60 से 77 पर जा पहुंचा, उसकी कीमत 100 रु. हो जाती।

पाकिस्तानियों का मन आत्मग्लानि से भर जाता। पता नहीं उनका मनोबल कितना नीचे गिरता। इसके बावजूद मुशर्रफ को जाना पड़ता! फरवरी के आम चुनाव के बाद उन्होंने जो भूल की, अच्छा हुआ उसे अभी नहीं दोहराया। अगर फरवरी में उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) के हारते ही वे इस्तीफा दे देते तो शायद पाकिस्तान की जनता उनके पीछे वैसे ही दौड़ती, जैसे कभी मिस्र की जनता अब्दुल गमाल नासिर के पीछे दौड़ी।

इसमें शक नहीं कि मुशर्रफ ने अपने लगभग नौ साल के शासनकाल में अनेक गंभीर भूलें भी कीं, लेकिन उनकी उपलब्धियां भी असाधारण थीं। नवाब अकबर बुग्ती की हत्या, लाल-मस्जिद पर हमला, वजीरिस्तान पर बमबारी, मुख्य न्यायाधीश की बर्खास्तगी, आपातकाल की घोषणा तथा नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के सुदीर्घ निष्कासन आदि ऐसे काम थे, जिनके कारण मुशर्रफ ने पाकिस्तान के लगभग हर तबके में अपने दुश्मन खड़े कर लिए।

बेनजीर की हत्या ने इस परिदृश्य को ज्यादा संगीन बना दिया। फौज और आईएसआई के अलावा मुशर्रफ के साथ कोई भी नहीं था। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेतागण भी उनसे बिदकने लगे थे। अभी कुछ हफ्ते पहले जब मुशर्रफ से मिलने का मेरा समय तय हुआ तो उनकी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शुजात हुसैन ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं जनरल साहब से जरा मालूम करूं कि कहीं वे अचानक इस्तीफा देकर रातों-रात पाकिस्तान तो नहीं छोड़ देंगे?

मुशर्रफ के बारे में अगर उनके पार्टी-नेता को ही यह संदेह था तो आप सोच सकते हैं कि आम जनता का ख्याल क्या होगा। जैसे नेपाल में हर आदमी यह मानकर चलता है कि नेपाल नरेश की हत्या उनके भाई ज्ञानेंद्र ने करवाई है, पाकिस्तान में आम लोग यह कहते हुए पाए गए कि मुशर्रफ के हाथ बेनजीर के खून से रंगे हुए हैं।

बेनजीर की हत्या के वक्त मुशर्रफ ने जैसी पथरीली प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, उसने पाकिस्तानियों के दिल में गहरा घाव कर दिया था। इसके पहले ही मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त करके मुशर्रफ पाकिस्तान के शहरियों में बदनाम हो गए थे।

एतजाज अहसन के नेतृत्व में देश के हजारों वकीलों, जजों, पत्रकारों, शिक्षकों और छात्रों ने मुशर्रफ की प्रतिष्ठा को तार-तार कर दिया था। यह वही प्रगतिशील तबका था, जो मुशर्रफ में कभी कमाल अतातुर्क को छिपा हुआ देखता था। अपनी पार्टी-वफादारियों के बावजूद ये लोग मन ही मन मुशर्रफ के दीवाने थे। इन्हें दुश्मन बनाने के बाद मुशर्रफ ने लाल मस्जिद के मुल्लाओं पर हमला बोला, बिल्कुल वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी ने भिंडरांवाले पर बोला था, लेकिन अफसोस कि मुशर्रफ के पक्ष में कोई भी वजनदार आवाज नहीं उठी।

वे पाकिस्तान के मजहबी तत्वों, ग्रामीण जनता और बे-पढ़े-लिखे तबकों में भी अलोकप्रिय हो गए। उन पर इस्लाम विरोधी होने का तमगा जड़ दिया गया। वे इधर से भी गए और उधर से भी। वजीरिस्तान के कबीलों पर हमला बोलकर उन्होंने अमेरिका के पिट्ठू होने का खिताब अर्जित किया। जो लोग आतंकवाद के खिलाफ हैं, उन्होंने भी मुशर्रफ के खिलाफ बयान दिए। नवाज शरीफ ने उन पर पाकिस्तान की संप्रभुता को गिरवी रखने का इल्जाम लगाया।

कुल मिलाकर मुशर्रफ की छवि ऐसी बन गई जैसे कि वे खुद को कायम रखने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं। वे मुख्य न्यायाधीश को बर्खास्त कर सकते हैं, संविधान को दरकिनार कर सकते हैं, अमेरिका का चरण-चुंबन कर सकते हैं, अकबर बुग्ती जैसे वयोवृद्ध नेता की हत्या करवा सकते हैं, बेनजीर को रास्ते से हटवा सकते हैं और चुनी हुई सरकार को लंगड़ा कर सकते हैं। आईएसआई को प्रधानमंत्री के सिर पर सवार कर सकते हैं।

कुल मिलाकर पाकिस्तान का कोई भी प्रांत मुशर्रफ के साथ नहीं रह गया था। मियां नवाज के तख्ता-पलट के कारण पंजाब खफा था, बेनजीर की हत्या से सिंध और बुग्ती की हत्या के कारण बलूचिस्तान बेगाना हो गया था और सरहदी सूबे के पठान मुशर्रफ की अमेरिका परस्ती के कारण नाराज थे। इसीलिए चारों प्रांतीय विधानसभाओं ने मुशर्रफ-विरोधी प्रस्ताव पारित कर दिए। उन विधायकों ने भी मुशर्रफ का विरोध किया, जो कल तक उनके समर्थक थे। पाकिस्तान में मुशर्रफ विरोधी अंधड़ इतना तेज हो गया था कि चलते रास्ते लोग अश्लील गालियां बकते थे। सिर्फ मुहाजिरों (भारत से गए हमारे मुसलमानों) को मैंने चुप्पी लगाए देखा। इसीलिए बाकायदा राष्ट्रपति चुने हुए उन्हें अभी एक साल भी नहीं हुआ और मुशर्रफ को इस्तीफा देना पड़ा।

इसका अर्थ यह नहीं कि मुशर्रफ को हिटलर या मुसोलिनी, अयूब या जिया, सद्दाम या शाहे ईरान की श्रेणी में रख दिया जाए। हम यह न भूलें कि मुशर्रफ ने ही निष्पक्ष चुनाव करवाए, नवाज और बेनजीर को लौटने दिया और अपनी पार्टी की हार के बावजूद विरोधियों की सरकार बनने दी। महाभियोग की धमकी के बावजूद उन्होंने संसद भंग नहीं की। वे चाहते तो अक्टूबर 1999 में तख्ता-पलट के बाद नवाज को फांसी दे सकते थे। जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह उन्हें भी फंसाया जा सकता था।

मुशर्रफ ने विरोधियों की सरकार से मेल-मिलाप की कोशिश भी की, लेकिन उन्हें हटाकर पाकिस्तान के नेताओं ने प्रतिशोध की राजनीति पर अमल किया। अच्छा है कि प्रतिशोध का यह भाव अभी तक संयत ही है। मुशर्रफ के नेपथ्य में सरकने के बाद पाकिस्तानियों को पता चलेगा कि पिछले नौ साल तक उन पर किस किस्म के आदमी की हुकूमत थी। क्या वे यह भूल जाएंगे कि मुशर्रफ ने पाकिस्तान का हाल अफगानिस्तान की तरह नहीं हो जाने दिया? उल्टे अपने लचीलेपन और चतुराई के दम पर उन्होंने अमेरिका से 60 हजार करोड़ रु. भी झाड़ लिए। आतंकवाद अपनी जगह कायम रहा और अमेरिकी भी बेवकूफ बनते रहे।

पाकिस्तान को शौकत अजीज जैसा अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री देकर मुशर्रफ ने आर्थिक हालात भी सुधारे। कारगिल के षड्यंत्रकारी ने आखिर भारत से भी संबंध सुधारे। मुशर्रफ के खिलाफ जो भी आरोप पत्र तैयार किया जाए, उसकी कीमत क्या है? आरोप लगाने वालों को क्या पाकिस्तान की जनता अच्छी तरह नहीं जानती? क्या यह कम बड़ी बात है कि मुशर्रफ ने अपने वादे के मुताबिक सेनाध्यक्ष का पद भी छोड़ दिया? क्या कोई तानाशाह ऐसी भूल करता है? वे अनूठे तानाशाह थे।

मुशर्रफ के हटने से एक युग का अंत अवश्य हो गया है लेकिन नए युग के उदय होने में अभी समय लगेगा। इस लोकतांत्रिक तानाशाह के हटने का मतलब यह नहीं कि पाकिस्तान में अब स्वस्थ लोकतंत्र का शुभारंभ हो जाएगा। अब जरदारी और नवाज में सीधी टक्कर होगी। सत्ता के अनेक केंद्र उभर आएंगे। जरदारी, नवाज, मुख्य न्यायाधीश, फौज और आईएसआई - ये पांच केंद्र तो होंगे ही। अभी अमेरिका से पिंड छुड़ाना भी आसान नहीं हैं। पाकिस्तान की दाल अब इन आधा दर्जन छलनियों में छनेगी।

भारत, अफगानिस्तान और ईरान जैसे पड़ोसियों और अमेरिका जैसे प्रभु देशों को अभी काफी पसोपेश का सामना करना पड़ेगा। मुशर्रफ को हटाकर जरदारी और नवाज सेमी फाइनल मैच जीत गए गए हैं। अब फाइनल मैच जरदारी और नवाज के बीच होगा। इस बीच अगर फौज ने हस्तक्षेप नहीं किया तो शायद पाकिस्तान में स्वस्थ लोकतंत्र के सूर्य का उदय हो जाए।
(लेखक पाक अफगान मामलों के विशेषज्ञ हैं)





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