जन्माष्टमी पर विशेष.
भगवान श्री कृष्ण को दुनियाभर में सामान्यत: एक ही रूप में पूजा जाता है। सबसे ज्यादा मान्यता और पूजा राधा जी के कृष्ण की होती है।
नटखट कृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण की ये छवि भी सबको भाती है। हरेक मां को अपनी गोद में श्रीकृष्ण जैसा सुंदर, शरारती और विरला पुत्र देखने की आकांक्षा होती है। श्रीकृष्ण वाकई ऐसे थे भी, बाल्यकाल से उनकी शरारतें, मित्रों के साथ उनके खेल, बड़े भाई की शिकायतें, मां के साथ खेल, माखन चोरी, गोवंश के साथ ऐसा लगाव कि उनकी मुरली की धुन पर हजारों गाय खुद ब खुद भागती हुई चली आती थी। यही हालत गोपिकाओं की थी। शरारत नहीं की तो परेशान और की तो माता यशोदा से शिकायत। बड़ा नटखट है नंद को लाल.. , मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो..शायद ही कोई ऐसा हो जिसने यह लाइनें न सुनी हों और न गाईं हों।
राधा के कृष्ण : वे माखन खाते और शिकायत नहीं आती तो उदास रहती थी गोपिकाएं। इसी बाल्यकाल में उनकी बांसुरी की दीवानी राधाजी उनकी सर्वप्रिय सखी थीं। उनके प्रेम की चर्चा या उसी रूप में स्वीकराते वाले लोगों को एक बात शायद ध्यान नहीं होगी कि जिस समय के ये किस्से हैं उस समय तक श्रीकृष्ण दस वर्ष से भी कम उम्र के थे क्योंकि कंस वध कर दिया था। उसके बाद उन्होंने ऐसी कोई लीला नहीं की। इसके बाद अगर ये कहा जाए कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा तो गलत नहीं होगा। यही नहीं उनकी याद में परेशान गोपिकाओं को समझाने के लिए उन्होंने उधव जैसे समझदार को भेजा हालांकि वे गोपियों के प्रेम के सामने निरुत्तर ही हो गए।
लीलाधर : लीलाओं के मामले में श्रीकृष्ण का शायद ही कोई मुकाबला पूरी दुनिया में मिले। पैदा होने के बाद से जब वे बोल नहीं पाते थे, तब ताड़का का वध, फिर खेल-खेल में भयानक जहरीले कालिया नाग को वश में करना। मां, यशोदा को मिट्टी खाने के बाद मुंह दिखाने के लिए कहने पर विराट रूप के दर्शन कराना। सुदामा को महल से खाली हाथ भेजा लेकिन उनके घर वापस पहुंचने से पहले सुदामा का नया घर तैयार कराया जाना। 16 हजार रानियों की देखरेख ही नहीं, कहते हैं जिस महल में भी देखो श्रीकृष्ण नजर आते थे। ऐसे मायावी थे।
बलवान : बाल लीलाओं में गोकुल को हिलाकर रख देने वाले श्रीकृष्ण पूरे इलाके की महिलाओं के प्रिय थे। हालांकि इसी बीच मात्र दस वर्ष की उम्र में मामा कंस के आमंत्रण पर मथुरा पहुंचे। उनके ललकारने पर वे युद्ध करने लगे। श्री कृष्ण ने इस युद्ध में कंस का वध कर राज्य को मुक्त कराया। उनकी माता देवकी और पिता वासुदेव को मुक्त कराकर उन्हें मथुरा का राज्य सौंप दिया और इसके बाद वे शिक्षा ग्रहण करने उज्जैन में सांदीपनी आश्रम चले गए।
शिष्य कृष्ण : श्रीकृष्ण वैसे तो सर्वज्ञ थे लेकिन मृत्युलोक के आचार के तहत बचपन में ही कंस वध के बाद अध्ययन के उज्जैन के सांदीपनी आश्रम में शिक्षा लेने के लिए गए। कहते हैं शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे अपने गुरू और गुरूमाता के इतनी प्यारे हो गए कि जब वे घर वापसी के लिए चले तो गुरूमाता का दुख फट पड़ा। उन्होंने गुरूमाता को इस तरह से रोते देख कहा माता आखिर कष्ट क्या है।
तब उन्हें बताया कि उनके पुत्र को कोई राक्षस उठा ले गया है, उसका कुछ पता नहीं चल रहा है। इस पर श्री कृष्ण ने जाने से पहले पुत्र वापसी का वचन दिया आखिर उन्होंने गुरूदक्षिणा में उनका पुत्र वापस लाकर दिया। इस तरह से पहले गुरू के आदर्श शिष्य बन कर शिक्षा ग्रहण की और बाद में उनका पुत्र वापस कर गुरू दक्षिणा भी ऐसी दी जिसकी कोई मिसाल नहीं है। कूटनीतिज्ञ : उनकी कूटनीति का गवाह तो महाभारत युद्ध का परिणाम ही है जिसमें करोड़ों की सेना के बाद भी पांडवों से कौरवों को कदम-कदम पर पराजय का सामना करना पड़ा। चाहे द्रोपदी के स्वयंवर का समय हो जब कर्ण को मछली भेदने से रोकने के लिए उनकी जाति पर आपत्ति के लिए द्रोपदी को प्रेरित किया।
दुयरेधन को जब मां गांधारी के सामने पूर्ण नग्न होकर जाना था, लेकिन वे श्रीकृष्ण की सलाह पर कमर पर केले के पत्ते लपेट कर पहुंचे। इससे बाकी शरीर तो दुयरेधन का बज्र हो गया लेकिन केले के पत्तों के कारण जहां गांधारी की नजर नहीं पहुंची वह हिस्सा कमजोर रह गया। यही हिस्सा बाद में दुयरेधन और भीम के बीच युद्ध में दुयरेधन की हार का कारण बना।
जरासंध से युद्ध के समय बार-बार रण से पीछे हटने की वजह से उन्हें रणछोड़ का नाम भी दिया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब कि जरासंध को भीमसेन युद्ध में बुरी तरह से पराजित कर मार दिया। सहायता के लिए पहुंचने पर अजरुन और दुयरेधन को इस तरह भ्रमित किया कि युद्ध के लिए दुयरेधन ने युद्ध के लिए श्रीकृष्ण के बजाए पूरी सेना ही मांग ली। उन्होंने दोनों से कहा था कि या तो वे सेना ले लें या फिर खुद उन्हें और वे युद्ध में शस्त्र भी नहीं उठाएंगे। बाद में उनकी समझदारी भरी रणनीति की ही वजह से अजरुन ने अपने बड़ी सेना को हराने का बड़ा काम किया।
सुदामा के कृष्ण : यह दोस्ती का सबसे आदर्श रूप है। जब उनके बाल सखा सुदामा बेहद गरीबी की हालत में द्वारिका में अपने सखा से मिलने पहुंचे तो द्वारिकाधीश के महल के सामने उनके चौकीदार और सुरक्षाकर्मियों ने उनकी हालत देख यह तक स्वीकार नहीं किया कि सर्वशक्तिशाली राजा का मित्र कोई इतना भी दीन-हीन हो सकता है। इसके बाद भी ज्यादा आग्रह के बाद किसी तरह श्रीकृष्ण तक यह खबर भिजवाई गई कि कोई दीन-हीन ब्राह्मण खुद को आपका मित्र बता रहा है।
नाम अपना सुदामा बताता है। बस इतनी जानकारी मिलते ही विश्राम कर रहे श्रीकृष्ण दीवानों की तरह महल के द्वार के तरफ भागे। अपने मित्र से इस तरह से मिलते ही उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वे अपने साथ ही मित्र को महल के अंदर लाए और उनकी दीन हीन दशा को देख खुद ही पैर धोने में जुट गए। इस बारे में सूरदास जी ने तो यह भी लिखा है-
पांव परात से हाथ छुओ नहीं,
नैनन नीर से पांव पखारे।
यानी आंखों से इस तरह से आंसुओं की धारा गिर रही थी कि पानी की परात से हाथ लगाए बिना आंसुओं से ही पैर धो दिए। ऐसे थे मित्र कृष्ण।
कर्मयोगी : महाभारत के युद्ध के समय निराश अजरुन को श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया। वह यही था कि अपने पराए के धर्म को देखो और धर्म फिलहाल आपके साथ है। इस तरह से फल की इच्छा किए बिना कार्य का उपदेश दिया। यही उपदेश युद्ध के मैदान में निराश खड़े अजरुन को ताकत देता है और वे धर्म के लिए अपने पितामह, गुरू और भाईयों से भी युद्ध करते हैं।
धर्मपरायण : धर्म के लिए जब कौरव और पांडवों में युद्ध की शुरूआत हुई तो श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए अपना राजपाट छोड़कर इस युद्ध में इस तरह से हिस्सा लिया कि शस्त्र उठाया भी नहीं लेकिन अजरुन पर किसी का भी शस्त्र कारगर भी नहीं होने दिया। चाहे भीष्म पितामह से युद्ध के समय शिखंडी के इस्तेमाल का हो, या फिर कर्ण-अजरुन युद्ध के समय कर्ण के मारक निशाने से बचने के लिए रथ के पहिए को जमीन में नीचे दबाना हो। जयद्रथ वध के लिए सूर्यग्रहण जैसी घटना का इस्तेमाल उन्हें सामान्य मानवों से अलग ही नहीं यथार्थ में भगवान या सर्वशक्तिमान के रूप में स्थापित करता है। दंडाधिकारी : कृष्ण जहां मित्र और मददगार रहे वहीं वे श्रेष्ठ दंडाधिकारी भी रहे। एक बार सभा में सभी श्रेष्ठ जनों के बीच शिशुपाल श्रीकृष्ण का अपमान कर रहे थे। श्री कृष्ण चुपचाप सुनते रहे। लेकिन 100 अपराध पूरे होते ही सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की गर्दन काट दी। दरअसल उन्होंने शिशुपाल की मां को उसके 100 अपराध माफ करने का वचन दिया था।
छोटे भाई : श्रीकृष्ण आदर्श छोटे भाई भी रहे। बलराम जी के क्रोध के सामने बहुत छोटे से लेकर द्वारिकाधीश होने तक श्रीकृष्ण ने कभी अपना छोटे भाई होने का दायित्व नहीं छोड़ा। यदि उनके मन की कोई बात बलदाऊ जी नहीं भी करते थे तो भी श्रीकृष्ण जी इस तरह से उसके विपरीत अपने मन के काम करते थे जिससे उनके बड़े भाई सिवाय हैरान हुए नहीं रह पाते थे।
महाभारत के मुताबिक जहां इस धर्मयुद्ध में वे अजरुन और पांडवों के साथ थे, वहीं बलदाऊ जी कौरवों के साथ थे और दुयरेधन उनके खास प्रिय थे। इस बात को लेकर कई बार संघर्ष हुए लेकिन हमेशा कृष्ण बड़े भाई का मान रखते हुए भी अपने मन की ही करते रहे। इस तरह से आदर्श छोटे भाई के रूप में देखा गया।
वरदान और अभिशाप भी : जहां श्रीकृष्ण को हर देवता और हर शक्ति मिली हुई थी। उनकी तर्जनी पर सुदर्शन चक्र का होना। कई अदृश्य अस्त्र और शस्त्र उनके पास थे, लेकिन वे कई बार इस तरह से चालें चलाते रहे कि उनके खिलाफ किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सका। हालांकि जब अपने पुत्र की तड़प-तड़प कर मौत की खबर सुनी तो गांधारी ने उसके लिए कृष्ण को ही जिम्मेदार ठहराया।
गांधारी का मानना था कि यदि कृष्ण ने बड़े होने की बात कहकर पूर्ण नग्न होकर जाने के बजाए केले के पत्ते लपेटने की सलाह न दी होती तो भीम की गदा दुयरेधन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसी बात से दुखी होकर गांधारी ने कहा था तुम भी इसी तरह तड़प कर मरोगे कोई सहायता भी नहीं कर सकेगा। कहते हैं कि वैसा ही हुआ था।
बहन के आदर्श भाई : अपनी बहन सुभद्रा जी के मन को देखते हुए उन्होंने अजरुन के साथ भेजने की योजना बनाई जबकि बलराम जी सुभद्रा को दुयरेधन के साथ भेजना चाहते थे। आखिर उनकी योजना के मुताबिक मंदिर दर्शन के समय अजरुन के साथ सुभद्रा जी चली गईं। इस मौके पर श्रीकृष्ण के बताए मुताबिक अजरुन के रथ की सारथी सुभद्रा ही बनी।
इसी तर्क के चलते बलराम जी अजरुन के खिलाफ अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सके। कारण यह था कि चश्मदीद के मुताबिक अर्जुन ने सुभद्रा जी को भगाया नहीं बल्कि सुभद्रा ही अपने मन के मुताबिक अजरुन के साथ गई थीं। इसी तरह से मानी हुई बहन द्रोपदी के चीरहरण के समय भी उन्होंने बिना किसी विध्न डाले चीर को इतना बढ़ा दिया कि चीर खींचते-खींचते खुद दुशासन ही थक गया।
आदर्श मेहमान या संबंधी : इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के बाद पांडवों के अश्वमेध यज्ञ के लिए एकत्र राजाओं की भीड़ को देखते हुए श्री कृष्ण ने मेहमानों के जूतों को साफ करने का काम किया। जिसे किसी भी मित्र या संबंधी के लिए आदर्श जैसी स्थिति है।