कोलकाता.आजकल के नन्हे-मुन्ने अस्वाभाविक रूप से आक्रामक होते जा रहे हैं। बचपन की उमंगें लड़ाई-झगड़े और गुस्सा उतारने में बदल गई हैं। नर्सरी के बच्चों में तेजी से बढ़ती इस आदत पर बाकायदा किए गए सर्वे से इसके कारण भी 21वीं सदी वाले नजर आए हैं।
यहां के विवेकानंद मिशन स्कूल ने ‘इमोशनल इंटेलिजेंट पैरेंटिंग’ का एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लोगों ने माना कि नन्हे-मुन्ने बच्चों द्वारा एक-दूसरे की पिटाई और कड़वे शब्द बोलने की आदत अब साधारण बात होती जा रही है। पूर्वी मिदनापुर के दिशारी के स्कूल में भी यही स्थिति है।
डॉक्टरों का मानना है कि ऐसा बच्चों के ज्यादा वीडियो, कंप्यूटर और मोबाइल गेम्स खेलने व काटरून फिल्में देखने के कारण होता है। साथ ही, माता-पिता का बच्चों को कम समय दे पाना भी इसकी एक वजह है। चार गुना बढ़े मामले : न्यूरो साइकोलॉजिस्ट डॉ सब्यसाची मित्रा के मुताबिक, बच्चों में ऐसी प्रवृत्ति पिछले कुछ वर्र्षो में चार गुना बढ़ी हैं। यहां तक कि कुछ अस्पतालों में तो ऐसे मामले दस गुना बढ़ गए हैं।
नन्हे बच्चों में कांप्लेक्स :
मनोरोग विशेषज्ञ शिखा डे बताती हैं कि आजकल मुश्किल से तीन साल के बच्चों में भी अक्सर अपने आपको दूसरे से बेहतर समझने का अवसाद देखा जाता है। उनके मुताबिक, पिछले एक माह के दौरान कोलकाता के उनके बोधगया क्लीनिक में ऐसे करीब पांच मामले आए हैं, जबकि पहले छह माह में एक या दो मामले आते थे।
एकल परिवार का खामियाजा :
भारतीय मन: विश्लेषण सोसाइटी के सचिव और कलकत्ता विश्वविद्यालय में व्यावहारिक मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ अरुप घोषाल इसका कारण कारण सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक तानेबाने को बताते हैं। उन्होंने बताया कि एकल परिवार होने के कारण बच्चों को काफी देर तक घर में माता-पिता की गैरमौजूदगी में रहना होता है। इससे बच्चे अवज्ञाकारी और गुस्सैल हो जाते हैं।