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इच्छा के घोड़े सड़क पर न दौड़ें

परदे के पीछे.रूमी जाफरी की फिल्म ‘गॉड तुसी ग्रेट हो’ में मनुष्य और ईश्वर की भूमिकाओं में कुछ समय के लिए फेरबदल हो जाता है और सभी की इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। परिणामस्वरूप सारी व्यवस्था भंग हो जाती है और झमेला खड़ा हो जाता है। अनहोनी के उस क्षण में खलनायक ने नायिका से विवाह की इच्छा प्रकट की थी, तो यह भी घटित होने लगता है। झमेले से परेशान नायक, ईश्वर को कहता है कि तुम्हारी ये दुनिया तुम्ही संभालो।

स्पष्ट है कि दुनिया इच्छाओं पर आधारित नहीं है परंतु तमाम नाइंसाफी और बदइंतजामी देखकर यह भी लगता है कि यह तर्क या न्याय आधारित नहीं है। हमने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे आदर्श पर चलने के लिए एक व्यवस्था खड़ी की है जिसने आदर्श के निर्वाह का भ्रम रचा है। संपूर्ण अव्यवस्था या अनार्की से बेहतर भ्रष्ट व्यवस्था को स्वीकारा गया है भले ही वह भ्रम पैदा करे। मनुष्य के विकास में इच्छाओं का महत्व प्रेरणा के स्रोत की तरह रहा है।

इच्छाओं के बेलगाम घोड़े हवा में उड़ सकते हैं परंतु व्यवस्था की ऊबड़ खाबड़, गड्ढे भरी सड़कों पर नहीं चल सकते क्योंकि एक व्यक्ति की इच्छा दूसरे व्यक्ति की इच्छा से टकराती है। फिल्म में नायक ईश्वर की शक्ति की सहायता से खलनायक को पराजित करता है परंतु क्लाईमैक्स में बिना किसी अतिरिक्त सहायता के वह अपनी मानवीय सीमाओं के भीतर रहकर खलनायक को पराजित करता है। याद कीजिए बोनी कपूर की ‘मि. इंडिया’ का क्लाइमैक्स, जिसमें नायक गायब होने की शक्ति को तिलांजलि देकर अपनी मानवीय शक्ति से मोगेंबो को पराजित करता है।

पराजय के बाद जब खलनायक जाने लगता है तब उसके व्यक्तित्व में अमिताभ, जो फिल्म में गॉड की भूमिका में हैं, की झलक दिखाकर निर्देशक ने यह इंगित किया है कि नायक की विजय की खातिर गॉड ने खलनायक की मति भ्रष्ट कर दी थी। इस एक शॉट से मानवीय प्रयास की गरिमा कम होती है परंतु फिल्म के प्लॉट में यह ठीक है। एक तीर्थयात्रा दल में एक चोर शामिल है जिसकी निगाह युवा विधवा के गहनों पर है परंतु उसका हर प्रयास एक बच्चे के अनायास उपस्थित होने से विफल हो जाता है।

यात्रा के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते चोर और विधवा में प्यार हो जाता है। धन्यवाद देने के लिए चोर उस बालक को खोजता है परंतु वह कहीं नहीं मिलता। जब लंबी कतार में चोर का नंबर आता है तब वह ईश्वर की प्रतिमा में उस बच्चे को देखता है और उसे समझ में आता है कि ईश्वर ने बच्चे का रूप धारण कर उसे चोरी से बचाया अन्यथा उसकी प्रेमकथा पनपती ही नहीं।

यह कथा इस फिल्म का हिस्सा नहीं है, परंतु असल बात वही है। फिल्म में मनुष्य और ईश्वर की भूमिकाओं को लेकर अमिताभ बच्चन और सलमान खान के बीच पद्य में संवाद वाला दृश्य बहुत ही अच्छा है। दोनों इस कदर व्यावसायिक लगते हैं कि उनके बीच का ऐश्वर्या वाला तनाव फिल्म में कहीं नजर नहीं आता। बच्चों द्वारा आतंकवादियों की पिटाई का दृश्य भी अच्छा है परंतु यथेष्ट प्रचार के अभाव में फिल्म की लहर नहीं बनी। आजकल प्रचार की लहर अच्छी फिल्म बनाने से ज्यादा जरूरी है।





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