अहमदाबाद.अहमदाबाद विस्फोटों की साजिश का खुलासा करने और आतंकियों के स्लीपर सेल बेनकाब करने का दावा करने के बावजूद गुजरात पुलिस और खुफिया विभाग को नहीं मालूम कि राज्य में असल में ऐसे कितने स्लीपर सेल सक्रिय हैं। संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) आशीष भाटिया ने भास्कर/डीएनए द्वारा बेनकाब ‘स्लीपर सेल’ के बारे में जानकारी मांगे जाने पर कुछ भी बताने से मना कर दिया।
दंगे का प्रतिशोध :
2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों से गुजरात के अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों में बदला लेने की भावना पैठ कर गई है। पुलिस के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन इसका फायदा उठा कर इन्हें अपने दस्तों में शामिल कर रहे हैं।
लापता ले रहे हैं ट्रेनिंग! :
इधर, भास्कर/डीएनए की पिछले 15 दिनों की जांच में खुलासा हुआ है कि अंडरवल्र्ड सरगना रसूल पाटी ने करीब 100 युवाओं को आतंकी ट्रेनिंग देने के लिए इकट्ठा किया है। 2002 के दंगों के बाद से लापता सैकड़ों लोगों में से कई इन आतंकी संगठनों में शामिल हो गए हैं।
सीमा पर सक्रियता बढ़ी :
जांच दलों ने भी भारत-पाक सीमा पर हाल में गतिविधियां तेज होने की बात कही है। कच्छ सीमा में निगरानी करने वाले जांच दल के एक अधिकारी ने बताया कि ‘गांवों में पहुंचने वाले तबलीगी मौलवियों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है।
वहीं, सीमा क्षेत्र में मस्जिदों व मदरसों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।’
हर जगह सक्रिय :
पुलिस के मुताबिक, स्लीपर सेल के ऐसे दस्ते बड़ोदरा, भरूच, मध्य गुजरात के ग्रामीण हिस्सों और बनासकांठा में सक्रिय हैं। कच्छ व नवसारी में इनकी मजबूत पकड़ बताई गई है। अहमदाबाद के घनी आबादी वाले वटवा, बापूनगर, जुहापुरा और दाणीलिमड़ा के इलाकों में भी इनकी मौजूदगी मानी जा रही है। वहीं, एक पूर्व खुफिया अधिकारी के मुताबिक, मध्य गुजरात के जनजातीय बहुल क्षेत्रों और दक्षिणी गुजरात में गुपचुप तरीके से भी आतंकी गतिविधियां जारी हैं।
क्या है स्लीपर सेल
स्लीपर सेल आतंकी संगठनों का एक गोपनीय दस्ता है, जो स्वतंत्र रूप से या उसके एक छोटे दस्ते के रूप में काम करता है। यह दस्ता समाज में ऐसे घुल-मिलकर रहता है, जिससे उन पर कोई शक न हो सके। इसमें शामिल लोग आतंकी संगठनों के नियमों का पालन करते हैं और उनका इशारा मिलने पर वारदात को अंजाम देते हैं।