भोपाल. आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की रूह कंपा देने वाला ‘वंदेमातरम्’ एक से बढ़कर एक जोशीले और मंत्रमुग्ध कर देने वाले 32 रूपों में प्रचलित रहा है।
फिलहाल यह यादगार संकलन उन 300 अमर रचनाओं का एक हिस्सा है, जिन्हें देश के कोने-कोने से इकट्ठा किया गया है। स्वाधीनता संग्राम में अलग-अलग भाषा-बोलियों और इलाकों में रचे गए ये गीत अपने जमाने में बेहद जनप्रिय हुए थे।
बाकायदा संगीत की धुनों पर स्वराज संस्थान ने इस भूली-बिसरी गीत संपदा को फिर से जिंदा किया है। गीतों का यह बेशकीमती खजाना संस्थान की उस कोशिश की एक कड़ी है, जिसके तहत 1790 से 1947 के बीच के क्रांतिकारी विचारों और व्यक्तियों को सूत्रबद्ध किया जा रहा है। ढाई साल पहले इस खजाने की खोजबीन जब शुरू हुई तो ऐसे तराने भी हाथ लगे जो लगभग लुप्त हो चुके थे।
ये गीत संस्कृत, हिंदी, उर्दू, मराठी, बांग्ला, बुंदेली, अवधी, भोजपुरी, मालवी, निमाड़ी, बघेली, गोंडी, भीली भाषा में हैं। ऐसे एक हजार गीतों को संकलित कर सूचीबद्ध किया गया है। इनमें से 300 गीत, संगीतबद्ध हो चुके हैं। संगीतकार उमेश तरकसवार, टीएस धर्मेश, मॉरिस लाजरस, केजी गिंडे, तापस नागराज और प्रकाश शुजालपुरकर के लिए इन गीतों को संगीत की धुनों में ढालना एक दौर को जीने जैसा तजुर्बा रहा।
इस टीम के मुताबिक ये गीत उन मजबूत जड़ों की झलक दिखाते हैं, जिनसे स्वाधीनता संग्राम ने 90 साल तक ऊर्जा पाई। इनमें कई गीत ऐसे हैं, जो अंग्रेजी हुकूमत के दौर में रचे गए तो कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें आजादी के बाद अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई।
इनमें बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ टैगोर, नजीर अकबराबादी, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, वीर सावरकर, वाजिद अली, बहादुरशाह जफर, बाबू कुंअरसिंह और अशरफ अली खां जैसे जाने-माने रचनाकार तो हैं ही, इनके अलावा कुछ गीत ऐसे भी हैं, जो खुद तो कहीं किसी के जेहन में बचे रह गए, लेकिन उनके रचयिता का नाम नहीं मालूम।
सलाखों में शायरी
गीतों के अलावा 45 किताबें नई पीढ़ी के दिमाग में उस संघर्ष की तस्वीरें ताजा करने वाली हैं, जो लाखों देशप्रेमियों ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी आखिरी सांसों तक किया। इनमें ‘तराना-ए-कफस’ शे’रो-शायरी का ऐसा दिलचस्प दस्तावेज है, जो 1922 में आगरा जेल में हर हफ्ते हुए मुशायरों में पेश हुआ। पेश करने वाले थे जेल में कैद सेनानी। प्राचीन भारत के गौरवशाली अतीत पर केंद्रित कुछ पुस्तकों में वराहमिहिर, भृर्तहरि, भवभूति और राजा भोज जैसे संस्कृति के अमर नायकों पर संग्रहणीय किताबें भी इस श्रंखला की अहम् कड़ी हैं।
इनका कहना है-
यह संकलन गुलामी के अंधेरे में संघर्ष की रोशनी की एक शानदार झलक दिखाता है। यह एक यादगार अनुभव रहा। हमने स्वाधीनता संघर्ष के अनछुए पृष्ठों की तलाश की और कई ऐसे गुमनाम चेहरे सामने आए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई को लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान की।
-श्रीराम तिवारी, निदेशक, स्वराज संस्थान संचालनालय।