संपादकीय. लगभग आठ साल पहले अस्तित्व में आया झारखंड एक ऐसा राज्य है जो अभी भी राजनीतिक स्थायित्व की समस्या से जूझ रहा है। अपने छोटे से इतिहास में इस राज्य ने पांच सरकारें देखी हैं और आज वहां एक बार फिर नेतृत्व का संकट उठ खड़ा हुआ है।
निर्दलीय मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, जिनको अपना पद केवल अंकगणित के संयोग से हासिल हुआ था, आज उसी गणित के जाल में फंसे नजर आ रहे हैं। सबसे विचित्र बात यह है कि जिस संगठन झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस राज्य के गठन के लिए लंबा आंदोलन लड़ा, वह संगठन और उसके मुखिया सत्ता में पूरी भागीदारी कभी नहीं ले पाए, बल्कि उनके समर्थन से ही अन्य सरकारें चलती रहीं।
नतीजा यह है कि सत्ता में बने रहने के खेल के सबसे विचित्र मोल भाव में आज झामुमो और यूपीए के समर्थन से चल रही कोड़ा सरकार से झामुमो ने इसलिए समर्थन वापस ले लिया क्योंकि झामुमो द्वारा केंद्र की यूपीए सरकार को समर्थन देने के बदले में किया गया वादा पूरा नहीं हुआ।
राजनीतिक लेन-देन का इससे खुला उदाहरण शायद ही हाल के वर्षो में देखने को मिला हो। सोरेन पहले तो कोयला मंत्रालय की रट लगाए रहे लेकिन जब उन्हें लगा कि कुछ महीनों की केंद्र की सत्ता से बेहतर है कुछ सालों की राज्य सत्ता, तब उनका निर्णय तो बदलना ही था।
नवंबर 2000 में राज्य बनने पर एनडीए की सरकार में भाजपा के बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने और मार्च २क्क्३ में अपनों की बगावत का शिकार हुए। फिर अजरुन मुंडा ने सत्ता संभाली और वे भी फरवरी 2005 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में सत्ता में नहीं आ पाए। किसी को स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद शिबू सोरेन ने दस दिनों तक सरकार चलाई, मुंडा फिर मुख्यमंत्री बने और अपनी ही पार्टी के भितरघात का शिकार हुए।
2006 में बारी आई निर्दलीय मधु कोड़ा की जो तब से सत्ता में हैं। आज सोरेन वह गद्दी प्राप्त करना चाहते हैं जिसे कोड़ा छोड़ना नहीं चाहते और दांव पर है ऐसी विधानसभा का भविष्य जिसमें किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं है और एक ऐसे राज्य का आर्थिक व राजनीतिक भविष्य जहां लगभग 60 हजार करोड़ रुपए का निवेश महज इसलिए लटका है कि वहां कोई सरकार नहीं है। कोई संदेह नहीं कि वहां भी विश्वास मत का नतीजा अप्रत्याशित निकले जिसकी पृष्ठभूमि में फिर वे ही घटनाएं हों जिनके लिए झारखंड जाना जाता रहा है।