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जमीन नहीं तो बांध नहीं

इंदौर. बुधवार को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण कार्यालय में अपनी पीड़ा बताने पहुंचे डूब प्रभावितों की गुहार सुनने के बजाय अफसरों ने मुख्य द्वार बंद कर दिया और दफ्तर में ही बैठे रहे।

आक्रोशित लोगों ने अंदर घुसने की कोशिश की और इस धक्का-मुक्की में दरवाजा टूट गया। वहां बैठी एक महिला पुलिसकर्मी भी सिर में कांच के टुक ड़े लगने से घायल हो गई। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर के नेतृत्व में सरदार सरोवर परियोजना से डूब में आ रहे झाबुआ, धार, बड़वानी, आलीराजपुर, खरगोन, गुजरात एवं महाराष्ट्र से सैकड़ों लोग सुबह एनसीए कार्यालय पहुंचे। लोगों ने मुआवजा वितरण में धांधलियों की शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करने पर एनसीए अफसरों पर मिलीभगत का आरोप लगाया।

बैक वाटर लेवल, एसपीआर, भूमि के बदले भूमि, बंजर जमीन देने एवं मछुआरों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था किए जाने आदि मुद्दों पर एनसीए को आड़े हाथ लिया। सुश्री पाटकर ने एनसीए के एक्जिक्यूटिव मेंबर वी.के. ज्योति से कहा जवाब लेकर ही जाएंगे।नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ एनसीए क्यों काम कर रहा है।

पुराने डूब प्रभावितों को ही मुआवजा नहीं दे रहे हैं, जमीन के बदले जमीन नहीं मिल रही है इसके बावजूद बांध की ऊंचाई क्यों बढ़ाई जा रही है? जमीन नहीं मिलेगी तो बांध की ऊंचाई नहीं बढ़ेगी। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज करते हुए ओंकारेश्वर में जलाशय के लिए 28 अगस्त को होने वाली ठेका पद्धति का विरोध करते हुए सुश्री पाटकर ने कहा हम कंपनी के किसी व्यक्ति को वहां पैर रखने नहीं देंगे।

उन्होंने कहा गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान में 40 हजार डूब प्रभावित हैं जिन्हें हक नहीं मिल रहा है। बिना सर्वे ही डूब प्रभावित आबादी तय की जा रही है। हर सवाल के जवाब में श्री ज्योति यही कहते रहे कि कार्रवाई करना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। शासन की नीतियों का पालन करना पड़ता है।





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